पूर्णिया में गांवों की बगिया से गुम हुए आम, कम दिख रही मिठास की आस

फलों का राजा कहलाने वाले आम की मिठास की आस इस बार कम दिख रही है. खासतौर पर आम के लिए इस साल लोग तरस जायेंगे.

कुछ मौसम के मिजाज से, तो कुछ फसल में कीट लग जाने से प्रभावित हुआ फलन

बाजारों में इस साल लोकल आम की होगी किल्लत, खरीदारी में आड़े आयेगी महंगाई

पूर्णिया. फलों का राजा कहलाने वाले आम की मिठास की आस इस बार कम दिख रही है. खासतौर पर आम के लिए इस साल लोग तरस जायेंगे. बाजारों में यदि देर से ही ये आम नजर भी आ गये तो उसकी खरीदारी में महंगाई आड़े आयेगी और जेब भी इजाजत नहीं देगी. इस साल कहीं मौसम की मार तो कहीं लापरवाही के कारण पूर्णिया के गांवों की बगिया से आम के फल गुम हो गये हैं. जानकारों की मानें तो इस बार पचास फीसदी से भी कम फसल की संभावना है क्योंकि कुछ मौसम के मिजाज से तो कुछ फसल में कीट लग जाने से आम का फलन प्रभावित हो गया है. यही वजह है कि आम उत्पादक और बगानों को लेने वाले ठेकेदार भी इस बार निराश दिख रहे हैं.

गौरतलब है कि मई के अंतिम सप्ताह तक बाजारों में लोकल आम की आमद शुरू हो जाती है, पर इसकी धमक अप्रैल में ही हो जाती है. आम उत्पादकों की मानें तो इस साल आम के पेड़ों में जबरदस्त मंजर आए थे इससे बेहतर कारोबार की उम्मीद भी बंधी थी. शहर से सटे रानीपतरा के ग्रामीण इलाके में इस साल आम के कई बगान सूने पड़े हैं. आम उत्पादकों का कहना है कि इस वर्ष आम के पेड़ में मंजर तो बहुत लगा था पर बीच के दिनों में आयी आंधी के बाद पेड़ से पूरा मंजर झड़ गया. आम उत्पादक शशि भूषण सिंह, रंजन मंडल और जगदीश सिंह कहते हैं कि यह सच है कि आम के मंजर झड़ गये पर कहीं न कहीं अपनी भी लापरवाही रही है. आम उत्पादकों की मानें तो सही समय पर कीट व्याधि के निदान के लिए दवा का छिड़काव नहीं हो सका. किसान पटवन की भी कमी को कारण बताते हैं.

कहीं पेड़ बीमार, तो कहीं झड़ गये मंजर

आलम यह है कि कारण चाहे जो हो, इस बार आम का फलन अपेक्षाकृत कम है. एक तरफ जहां समय पर उपचार के आम के कई पेड़ बीमार हो गये तो कहीं आंधी टिकोले झड़ गये. कई आम उत्पादक भी इस बात को मानते हैं कि इस बार आम बगान का रखरखाव की व्यवस्था में चूक हो गयी है इस कारण आम के पेड़ कीटों की चपेट में आ गये, जबकि आंधी-पानी का भी कमोबेश असर हुआ. आम उत्पादक सूरज कुमार की माने तो उनके बगान में आम के पेड़ एक सौ से अधिक हैं और अमूमन सभी पेड़ों की स्थिति समान है. आम उत्पादक मो मजीद और बबलू साह भी आम में फलन कम होने के कारण निराश दिख रहे हैं. इधर, पूर्णिया सिटी, चिमनी बाजार और कसबा के इलाकों के बगानो की स्थिति बहुत अच्छी नहीं हैं. परेशानी समय से पहले बगान खरीदने वाले ठेकेदारों की भी है. एक तरफ पूंजी डूबने का डर है तो दूसरी ओर घाटा की आशंका भी है.

कहते हैं अधिकारी

वर्तमान स्थिति को सीधे तौर पर फलन कम होने की बात नहीं कही जा सकती. ऐसी संभावना फिलहाल नहीं दिख रही है. ऐसे देखा जाय तो एक पेड़ में जितने मंजर आते हैं उनका 99 प्रतिशत भाग का झड़ जाना सामान्य बात है. करीब 1 प्रतिशत मंजर में ही आम के फल लगते हैं. विभाग द्वारा नए बाग़ लगाने के लिए सरकारी स्तर पर प्रथम वर्ष में आम के पौधे उपलब्ध कराए जाते हैं और दूसरे वर्ष 90 प्रतिशत पौधों के जीवित रहने की स्थिति में उन किसानों को शेष 40 प्रतिशत राशि प्रदान की जाती है. सहायता के रूप में प्रति हेक्टेयर 50 हजार की राशि दी जाती है जिसमें दो वर्षों में यह अनुपात 60 और 40 प्रतिशत का होता है. मई माह में योजना के आने की संभावना है उसके बाद किसान आवेदन कर सकते हैं.

डा. राहुल कुमार सिंह, जिला उद्यान पदाधिकारी, पूर्णिया

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आंकड़ों पर एक़ नजर

1500 हेक्टेयर में है आम आच्छादन का क्षेत्र

800 हेक्टेयर क्षेत्रफल में लगाए गये हैं लीची के पेड़

1.60 लाख से अधिक हैं जिले में आम के पेड़

25000 से अधिक छोटे किस्म के पेड़ अलग-अलग गार्डेन में लगे हैं

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