समकालीन हिंदी उपन्यास पर पूर्णिया में राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न पूर्णिया. साहित्य विभाग कला भवन एवं साहित्याकाश, ग्रीनहाऊस रामबाग पूर्णिया के संयुक्त तत्वावधान में कला भवन में समकालीन हिन्दी उपन्यास पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न हुई. इस दौरान पूर्णिया की माटी के कहानीकार दीर्घ नारायण द्वारा रियल स्टेट की काली दुनिया पर लिखे गए उपन्यास ‘अधभूतल ९६’ पर आलोचकीय विमर्श हुआ. हिंदी कहानी एवं उपन्यास के पुरोधा शिवमूर्ति एवं प्रख्यात साहित्यकार डॉ रजनी गुप्त मुख्य वक्ता थे तथा पूर्णिया निवासी मूर्धन्य साहित्यकार चंद्र किशोर जायसवाल ने गोष्ठी की अध्यक्षता की और बिहार के कई नामचीन आलोचकों ने विशिष्ट वक्तव्य प्रस्तुत किये. उपन्यास ‘अधभूतल ९६’ वर्ष 2025 में प्रलेक प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ है. रियल एस्टेट की काली दुनियां की परत दर परत पड़ताल करने वाले समकालीन हिन्दी उपन्यास की समालोचना के दृष्टिकोण से इस उपन्यास पर यह एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी थी. हिंदी कहानी एवं उपन्यास के शिखर पुरुष लखनऊ निवासी शिवमूर्ति और प्रख्यात कहानीकार रजनी गुप्त इस संगोष्ठी के मुख्य वक्ता थे. श्री शिवमूर्ति ने कहा कि पूर्णिया सच में साहित्य नगरी है और सतीनाथ भादुड़ी, अनूप लाल मंडल, फणीश्वर नाथ रेणु और चन्द्रकिशोर जायसवाल की कड़ी के लेखक हैं दीर्घ नारायण. उन्होंने कथावस्तु और शैली की दृष्टि से इसे एक अद्भुत उपन्यास बताया. रजनी गुप्त ने रियल स्टेट की काली परतों को उघाड़ने वाले इस कृति को एक कालजयी उपन्यास बताया. चंद्रकिशोर जायसवाल ने दीर्घ नारायण की लेखकीय शैली को अनूठा बताया. आलोचक पंकज शर्मा (एलएनएम कॉलेज वीरपुर) ने दीर्घ नारायण की औपन्यासिक दृष्टि को अद्वितीय बताते हुए कहा कि उपन्यास के सातों अध्याय में औपन्यासिक विजन की सतरंगी छटा दिखाई देती है. आलोचक विनय कुमार चौधरी (पूर्व विभागाध्यक्ष हिन्दी विभाग, मधेपुरा विश्वविद्यालय) ने उपन्यास की संरचना को लेखकीय दृष्टि से सम्पन्न कहा. आलोचक मांगन मिश्र मार्तण्ड मार्तंड (संपादक, संवदिया) ने इस उपन्यास को प्रेमचंद और रेणु की परंपरा का बताया. डॉ संजय कुमार सिंह (प्राचार्य केबी झा महाविद्यालय, कटिहार) ने इस उपन्यास में आम जनों की छटपटाहट को जीवंत रूप में प्रस्तुत पाया. आलोचक रामनरेश भक्त (पूर्व प्राचार्य जिला स्कूल, पूर्णिया) ने कहा कि इस उपन्यास में सन्निहित अंतर्वस्तु में आम निवेशकों की पीड़ा समाहित है. कहानीकार डॉ निरुपमा राय (संस्कृत विभाग, पूर्णिया विश्वविद्यालय) ने उपन्यास में पात्रों के चरित्र निर्माण को अद्भुत बताया. आलोचक वंदना भारती ने कहा कि दीर्घ नारायण ने उपन्यास में देश की भविष्य के लिए एक बड़ा संकेत छोड़ गये हैं. आलोचक यमुना प्रसाद बसाक ने उपन्यास की भाषा की लहरदार बताते हुए कहा कि यह एक पठनीय कृति है. डॉ शंभु कुशाग्र (अंग्रेज़ी विभाग, पूर्णिया विश्वविद्यालय) ने उपन्यास के कतिपय कमजोर पक्ष का उल्लेख किया. उपन्यासकार दीर्घ नारायण ने इस उपन्यास की रचना प्रक्रिया के बारे में बताया कि यह ग्राउंड जीरो पर लिखा गया उपन्यास है. अंत में डॉ के के चौधरी ने धन्यवाद ज्ञापित किया.
‘अधभूतल ९६’ रियल स्टेट की काली दुनिया का आईना है : शिवमूर्ति
समकालीन हिंदी उपन्यास पर पूर्णिया में राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न
