पूर्णिया के रामलाल कॉलेज में गोस्वामी तुलसीदास पर संगोष्ठी: प्रधानाचार्य डॉ. कमाल बोले- 'रामचरितमानस केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का विराट ग्रंथ है'

रामलाल कॉलेज में गोस्वामी तुलसीदास पर आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने रामचरितमानस को केवल धार्मिक ग्रंथ से कहीं बढ़कर बताया. इसे भारतीय जीवन-दर्शन, सामाजिक आदर्श और मानवीय संवेदनाओं का विराट ग्रंथ करार दिया गया. नई पीढ़ी को तुलसी साहित्य से जोड़ने और उनकी शिक्षाओं को जीवन में उतारने पर जोर दिया गया.

भवानीपुर (पूर्णिया). रामलाल महाविद्यालय परिसर में हिंदी साहित्य के महान संत कवि एवं रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास पर संगोष्ठी आयोजित की गई. कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्रधानाचार्य डॉ. मुहम्मद कमाल ने की. मुख्य अतिथि सेवानिवृत्त अभियंता सुरेश शर्मा एवं सुधीर कुमार रहे. कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन तथा तुलसीदास के चित्र पर माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया.

तुलसीदास ने लोकभाषा को बनाया जनचेतना का माध्यम

प्रधानाचार्य डॉ. मुहम्मद कमाल ने कहा कि तुलसीदास केवल कवि नहीं, बल्कि भारतीय लोकचेतना के युगद्रष्टा साहित्यकार थे. उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से धर्म को लोकमंगल, भक्ति को मानवीय संवेदना और साहित्य को जनजीवन से जोड़ने का कार्य किया. उन्होंने कहा कि तुलसीदास की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने संस्कृत की गूढ़ साहित्यिक परंपरा के ज्ञान को लोकभाषा के माध्यम से आम लोगों तक पहुंचाया.

रामचरितमानस में जीवन-दर्शन और मानवीय मूल्य

डॉ. कमाल ने कहा कि रामचरितमानस केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन, सामाजिक आदर्श, पारिवारिक मर्यादा, कर्तव्यबोध और मानवीय संवेदनाओं का विराट ग्रंथ है. वर्तमान दौर में सामाजिक और नैतिक मूल्यों के सामने अनेक चुनौतियां हैं. ऐसे समय में तुलसीदास की रचनाएं समाज को संयम, समरसता, त्याग, सत्य और कर्तव्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं.

नई पीढ़ी को तुलसी साहित्य से जोड़ने पर जोर

प्रधानाचार्य ने कहा कि नई पीढ़ी को तुलसी साहित्य से जोड़ना केवल साहित्य का अध्ययन कराना नहीं, बल्कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों और मानवीय मूल्यों से परिचित कराना भी है. उन्होंने तुलसीदास की साहित्यिक विरासत को वर्तमान समय में भी प्रासंगिक बताया.

लोकमंगल और जीवन की अनुभूति से जुड़ी हैं रचनाएं

मुख्य अतिथि सुरेश शर्मा ने कहा कि तुलसीदास की रचनाओं में भक्ति के साथ जीवन की गहरी अनुभूति और लोकमंगल की भावना निहित है. उनकी रचनाएं आज भी समाज को सही दिशा देने में सक्षम हैं.वहीं मनोज कुमार ने तुलसीदास की विभिन्न कृतियों का उल्लेख करते हुए उनके काव्य-सृजन की विशेषताओं पर चर्चा की. उन्होंने कहा कि तुलसीदास के मन में उत्पन्न भाव सहज रूप से उनकी कविता का स्वरूप ग्रहण कर लेते थे.

भक्ति, दर्शन और सामाजिक समरसता का अद्भुत समन्वय

वक्ताओं ने कहा कि तुलसीदास भक्तिकाल के महान कवि होने के साथ लोकभाषा के अप्रतिम साहित्यकार भी थे. उनकी रचनाओं में भक्ति, दर्शन, नीति, सामाजिक समरसता और आदर्श मानवीय चरित्र का अद्भुत समन्वय मिलता है. भगवान श्रीराम के चरित्र के माध्यम से उन्होंने सत्य, त्याग, कर्तव्य, करुणा और मर्यादा को मानव जीवन का आधार बताया.

शिक्षक और विद्यार्थी रहे मौजूद

समारोह में महाविद्यालय के शिक्षक, शिक्षकेतर कर्मचारी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे. वक्ताओं ने तुलसीदास की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत को स्मरण करते हुए उनके आदर्शों को जीवन में आत्मसात करने का आह्वान किया.


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By Prabhat khabar news desk

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