चुनाव की डुगडुगी बजते ही सियासी दलों की धड़कनें हुईं तेज पूर्णिया. एक अनार सौ बीमार. पूर्णिया सीट को लेकर सियासी नेताओं पर यह कहावत सटीक बैठती है. दरअसल, इस बार के चुनाव में अधिकांश सीटों पर या तो पहले से ‘नो वेकेंसी’का बोर्ड लटका हुआ है या फिर टिकट काउंटर खुलते ही ‘हाउलफुल’हो जा रहा है. नतीजा यह है कि कतार में खड़े अधिकांश प्रत्याशियों की भीड़ उस सीट पर बढ़ती जा रही है जहां टिकट की उम्मीद थोड़ी बहुत बची हुई है. पूर्णिया की सात सीटों में से पूर्णिया सदर इकलौती सीट है जिसपर सभी दलों की निगाह है. खास यह है कि सभी दलों में आधा दर्जन से अधिक प्रत्याशी न केवल टिकट की कतार में खड़े हैं बल्कि हर प्रत्याशी अपने-अपने आका के यहां डेरा डाले हुए हैं. पूर्णिया की सीट पर भाजपा का लगातार कब्जा बरकरार है. इस सीट को लेकर भाजपा में भी कम हलचल नहीं है. हर सुबह पत्ता कटने और फिर शाम ढलते ही सीट बचने की एक नई कहानी गढ़ी जाती है. पार्टी के अंदरखाने की मानें तो पार्टी नेतृत्व ने सीटिंग सीट पर अभी अपना पत्ता नहीं खोला है. इधर,पार्टी का एक तबका पार्टी नेतृत्व को ‘एंटी इनकंबेंसी’की बात कहकर समझाने की कोशिश में जुटा है. अगर अंतिम क्षणों में कोई विचार होता है तो भाजपा में ऐसे आधा दर्जन प्रत्याशी पहले से बायोडाटा बनाकर तैयार बैठे हैं जो टिकट की रेस में सबसे आगे निकल जाने को व्याकुल हैं. इधर, महागठंधन के घटक दलों के बीच भी इस सीट को लेकर जबर्दस्त घमासान मचा हुआ है. 2020 के चुनाव में इस सीट पर एनडीए के खिलाफ महागठबंधन ने कांग्रेस प्रत्याशी को खड़ा किया था. इस बार इस सीट पर कांग्रेस में प्रत्याशियों की होड़ लगी है. टिकट को लेकर अभी से टिकटार्थी पटना से दिल्ली तक खाक छान रहे हैं. इधर, माकपा भी इस सीट पर दावा ठोक रही है. कुल मिलाकर पूर्णिया सीट पर हर किसी की निगाह है. नतीजा यह है कि हर जगह की भीड़ यहीं इकठ्ठी हो गई है. हर रोज एक नया प्रत्याशी अवतार ले रहा है. हर के अलग-अलग तर्क हैं तो दावे भी.
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