पूर्णिया स्थित रेणु रंगमंच संस्थान के कार्यालय में संस्थान की उपाध्यक्ष निहारिका नेहा की अध्यक्षता में एक विशेष 'नाट्य परिचर्चा' का आयोजन किया गया. इस संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य आधुनिक दौर में कला, नाटक और क्षेत्रीय लोक संस्कृति के गिरते स्तर पर गंभीर विचार-विमर्श करना तथा विलुप्त हो रही सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने के व्यावहारिक उपायों पर प्रकाश डालना था.
"कला और लोक संस्कृति को बचाने के लिए चलाना होगा जन-आंदोलन"
परिचर्चा की शुरुआत करते हुए संस्थान के सचिव अजीत कुमार सिंह 'बप्पा' ने कहा:
"रंगमंच हमारी मां के समान है, जहां से हम न केवल कला की बारीकियां सीखते हैं, बल्कि समाज को एक नई और सकारात्मक दिशा भी देते हैं. आज हमारी समृद्ध लोक संस्कृति विलुप्ति के कगार पर पहुंच रही है, जिसे बचाने के लिए सभी रंगकर्मियों को एक 'जन-आंदोलन' के रूप में संकल्पबद्ध होकर काम करना होगा."
रील्स और पश्चिमी संस्कृति के अंधानुकरण पर चिंता
कार्यक्रम में शामिल विभिन्न कलाकारों ने आज के डिजिटल दौर में युवाओं की जीवनशैली पर चिंता व्यक्त की:
- रंगकर्मी मनीष कुमार: "रंगमंच केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना जगाने का सशक्त माध्यम है. युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने के लिए जमीनी स्तर पर सार्थक नाटकों का मंचन जरूरी है."
- कला प्रेमी नीलू कुमारी: उन्होंने कहा कि समाज पश्चिमी संस्कृति का अंधानुकरण कर रहा है, इसलिए हर व्यक्ति को कला, नृत्य या संगीत से अवश्य जुड़ना चाहिए.
- रंगकर्मी अदिति कुमारी: आज की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया और रील्स के सीमित दायरे में सिमट गई है, जिसे बाहर निकालकर नाट्य कला से जोड़ना होगा.
- रंगकर्मी तुषार: विलुप्त हो रही सांस्कृतिक धरोहरों को बचाने के लिए नए कलाकारों को मंच प्रदान करना बेहद आवश्यक है.
स्कूलों और कॉलेजों तक पहुंचे नाट्य कला
सरकारी विद्यालय के शिक्षक व रंगकर्मी अवधेश कुमार ने महत्वपूर्ण सुझाव देते हुए कहा कि नाटक का दायरा केवल नाट्य संस्थाओं तक सीमित न रहकर अब स्कूलों और कॉलेजों के पाठ्यक्रम व गतिविधियों तक विस्तारित होना चाहिए. वहीं रंगकर्मी अखिलेश कुमार ने साहित्य और संस्कृति को आधार बनाकर रंगकर्म को आगे बढ़ाने पर जोर दिया.
लोक कलाओं में युवाओं की भागीदारी जरूरी — निहारिका नेहा
अध्यक्षीय भाषण में संस्थान की उपाध्यक्ष निहारिका नेहा ने कहा कि लोकनाट्य, लोक संगीत और लोक नृत्य जैसी पारंपरिक विधाओं में जब तक युवाओं की सक्रिय भागीदारी नहीं होगी, तब तक क्षेत्रीय पहचान को अक्षुण्ण रखना कठिन होगा. उन्होंने सभी सांस्कृतिक प्रेमियों से एकजुट होकर काम करने की अपील की.
