गुलाबबाग में जीवंत हो रही गुलाल के संग राजस्थान की बीकानेरी संस्कृति

चंग की थाप संग थिरक रहे युवा

छायी है राजस्थान की फाल्गुनी मस्ती, चंग की थाप संग थिरक रहे युवा

शिवरात्रि के बाद से ही होलियाना मूड में आ गये हैं लोग, कर रहे मस्ती

पूर्णिया. होली में अब महज तीन दिन शेष हैं फिर भी अपने शहर में मिनी राजस्थान कहे जाने वाले गुलाबबाग में राजस्थान की फाल्गुनी मस्ती छायी हुई है. यहां शिवरात्रि के बाद से ही लोग होलियाना मूड में आ गये हैं. शाम होने के बाद से ही महफिल सज जाती है जिसमें राजस्थान की बीकानेरी संस्कृति जीवंत हो उठती है. देर रात तक भी किसी के घर, कभी मंदिर तो गलियों और नुक्कड़ परचम की थाप सुनाई देती है. समूह में बैठे लोग देर रात तक चंग की थाप पर राजस्थान का लोकगीत गाते हैं.राजस्थानी गीतों की धुनों पर युवा, बुजुर्ग और बच्चे भी थिरकते हैं. उम्र का अंतर यहां लोगों के जीने के अंदाज और त्योंहार की मस्ती में आड़े नहीं आता.

दरअसल, गुलाबबाग का यह इलाका व्यावसायिक क्षेत्र में सफलता की तमाम सीढ़ियों को लांघ जाने वाले मारबाड़ी समाज का एक बड़ा बसेरा है. राजस्थान से यहां आकर व्यवसाय करने वाले ये लोग न केवल देश की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में जुटे हैं बल्कि अपनी संस्कृति को भी अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए प्रयासरत हैं. यही वजह है कि वे होली का स्वागत राजस्थान की परम्पराओं के अनुकूल करते हैं. यहां होली की चहल-पहल वसंत पंचमी से शुरु हो जाती है पर शिवरात्रि से उत्सव का रंग जमने लगता है. सड़कों पर तोड़ण द्वार लगाए जाते हैं. बिजली के झिलमिल बल्ब सजाए जाते हैं और शाम के बाद रोजाना युवकों का जत्था जुट जाता है. कोई मंच नहीं होता, बाहरी गवैया नहीं होता. बूढ़े-बच्चे सब जुटते हैं और फिर सजती है राजस्थानी गीत-संगीत की महफिल जिसमें सामूहिक रुप से सभी गाते-बजाते और नाचते भी हैं.

निराली है सांग की छटा

इसमें सांग की छटा निराली होती है. सांग के तहत राजस्थान की अलग-अलग वेश-भुषाओं में सज धज कर वाद-संवाद प्रस्तुत किया जाता है. रंग विरंगे गोटों से सजा घेरदार घाघरा, कांचली कुरती और उस पर ओढ़नी लटकाए सोलहों श्रृंगार कर युवकों की टोली युवती के मेकअप में राजस्थान के पसंदीदा नाचों का मनोरंजक प्रदर्शन करती है. हास -परिहास भी खूब होते हैं काली छींट रो घाघरो… भर यौवन में नाव डुबगी…भाई का ब्याह करवा देअरे कोन्या फिरेकंवारा…!

ठंडई से होता है स्वागत

शुद्ध मलाईदार दूध में मेवा-मसालों को मिलाकर बनायी गई ठंडई से यहां आगंतुकों का स्वागत होता है. आप चाहे जितना गटक लें. कोई बड़ा-छोटा नहीं, कोई अमीर गरीब नहीं, जाति समुदाय का बंधन-बंटवारा नहीं. मिठाइयों का भी खास इंतजाम होता है. सबके सब एक साथ बैठ कर लुत्फ उठाते हैं. अब तो घरों में भी यह आयोजन होने लगा है. शिवरात्रि से होली तक क्रमवार रुप से लोग एक-एक घरों में जुटते हैं जहां होली के पारंपरिक गीतों के साथ जमकर मस्ती होती है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Published by: Sanjit shukla

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.
और पढ़ें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >