बंगाली समाज की महिलाओं ने सिंदूर की होली खेलकर दी मां को दी विदाई

विवाहित महिलाओं ने देवी की पूजा अर्चना कर एक दूसरे को लगाया सिंदूर

विवाहित महिलाओं ने देवी की पूजा अर्चना कर एक दूसरे को लगाया सिंदूर

अपनी परम्परा का निर्वाह करते हुए मां से की अगले साल फिर आने की प्रार्थना

पूर्णिया. विजयादशमी का दिन, हर आंखें नम, देवी दुर्गा का जयकारा और हाथों में लाल सिंदूर लिए एक दूसरे के गाल को लाल करती महिलाएं…! भट्ठा दुर्गाबाड़ी का यह दृश्य भावुक कर देने वाला था. लगातार नौ दिनों की साधना के बाद देवी दुर्गा की विदाई के क्षण में पूर्णिया के बंग समाज की महिलाएं भावनाओं में बह रही थी. उनके चेहरे पर एक तरफ नवरात्र के निर्विघ्न पूजन अनुष्ठान के खुशी थी तो दूसरी ओर उनकी विदाई का गम भी था. भट्ठा दुर्गाबाड़ी में बीते बुधवार को पारंपरिक ‘सिंदूर खेला’ की रस्म पूरी आस्था के साथ निभाई गई. शारदीय नवारात्र के समापन पर बंग समाज की महिलाओं ने एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर माता दुर्गा को भाव पूर्ण विदाई दी और खुशियों का खजाना लेकर अगले साल फिर आने की विनती की.

महिलाओं ने बताया कि माता की विदाई की बेला में वे सब काफी भावुक हो जाती हैं. वे लोग माता को सिंदूर लगाकर विदाई देते हैं. एक दूसरे को सिंदूर लगाकर माता से अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं. उन्होंने कहा कि जिस तरह बेटी की विदाई होती है उसी तरह वे लोग माता की विदाई करते हैं. महिलाओं के अनुसार बंगाली परंपरा में देवी दुर्गा को घर की बेटी माना जाता है. दशमी के दिन यह माना जाता है कि बेटी अपने मायके से ससुराल लौट रही है. इसी प्रतीकात्मक विदाई को वे खुशी और भावनाओं के साथ मनाती हैं. इसमें एक-दूसरे को सिंदूर लगाया जाता है. ढाक की थाप पर नृत्य के साथ देवी के समक्ष आशीर्वाद मांगने की भी परंपरा का निर्वाह किया जाता है.

इस अवसर पारंपरिक लाल-सफेद साड़ियां पहने महिलाएं और सिंदूर से सजे उनके चेहरे भावनाओं से भरे होते नजर आए. जयकारे की गूंज की साथ जब प्रतिमा को निकालने का समय आया तो महिलाओं की आंखों में आंसू भी आ गए. महिलाओं ने बताया कि वे पहले दुर्गा मां को सिंदूर चढ़ाती हैं. फिर, एक-दूसरे को सिंदूर लगाती है और सिंदूर से होली खेलती हैं. इस दौरान वे सभी को विजयादशमी की शुभकामनाएं देती हैं. महिलाओं की मानें तो यह बंगाली संस्कृति का एक अहम हिस्सा है और उन सबके लिए भावनाओं से जुड़ा एक पवित्र अनुष्ठान है. वे मानती हैं कि सिंदूर खेलने से देवी दुर्गा का आशीर्वाद घर-परिवार में बना रहता है.

सुहाग और सौभाग्य का प्रतीक: सोनाली

दुर्गाबाड़ी की सोनाली चक्रवर्ती बताती हैं कि बंग समाज में सिंदूर को सुहाग और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है. यही वजह है कि इस रस्म से महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन और परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना करती हैं. दुर्गा पूजा के बाद जब देवी मां अपने ससुराल लौटती हैं, तब महिलाएं उन्हें सिंदूर लगाकर विदा करती हैं. ऐसी मान्यता है कि मां की शक्ति परिवार के सदस्यों, विशेषकर बच्चों और पतियों के संकट को दूर करती है. विवाहित बंगाली महिलाएं लाल किनारी वाली सफेद साड़ी पहनकर इस आयोजन में शामिल होती हैं.

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