MLC Deepak Prakash: राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने फिलहाल अपने बेटे और मंत्री दीपक प्रकाश की कुर्सी बचा ली है. राज्यपाल ने दीपक प्रकाश को विधान परिषद का मनोनीत सदस्य बना दिया है. उनका कार्यकाल मार्च 2027 तक ही रहेगा. यानी उन्हें अभी सिर्फ करीब सात महीने की राहत मिली है. अगर इसके बाद भी दीपक प्रकाश को मंत्री बने रहना है तो उपेंद्र कुशवाहा को फिर बीजेपी से एक और एमएलसी सीट की जरूरत पड़ेगी.
फिलहाल उपेंद्र कुशवाहा ने बड़ी परेशानी टाल दी है, लेकिन आने वाले सात महीने उनके लिए आसान नहीं होंगे. माना जा रहा है कि इस दौरान बीजेपी, RLM के अपने दल में विलय का दबाव बढ़ा सकती है. अब कुशवाहा क्या फैसला लेते हैं, उसी पर उनकी और उनके परिवार की आगे की राजनीति काफी हद तक निर्भर करेगी.
अपनी ही पार्टी में भी चुनौती
उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी में चार विधायक हैं. इनमें उनकी पत्नी स्नेहलता कुशवाहा भी शामिल हैं. बाकी तीन विधायक- माधव आनंद, आलोक सिंह और रामेश्वर महतो पहले भी अलग होने की स्थिति में पहुंच गए थे. उस समय दीपक प्रकाश को मंत्री बनाए जाने के बाद पार्टी में नाराजगी बढ़ गई थी. बाद में उपेंद्र कुशवाहा ने नेताओं को अलग-अलग जिम्मेदारी देकर मामला संभाल लिया था.
उस पूरे घटनाक्रम ने उपेंद्र कुशवाहा को यह संकेत दे दिया था कि उनकी पार्टी तब तक सुरक्षित है, जब तक बीजेपी उसे तोड़ने की कोशिश नहीं करती. इसलिए मौजूदा हालात में भी उन्हें अपने राजनीतिक फैसले बेहद सोच-समझकर लेने होंगे.
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था मंत्री बने रहने का मामला
दीपक प्रकाश बिना किसी सदन के सदस्य बने दोबारा मंत्री बनाए गए थे. इसी को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. कोर्ट ने इस पर हैरानी जताई और सम्राट चौधरी सरकार से जवाब मांगा. इसके बाद यह मामला उपेंद्र कुशवाहा के पक्ष में जाता दिखा.
जून में विधान परिषद की 10 सीटों के चुनाव हुए थे, लेकिन उस समय बीजेपी ने दीपक प्रकाश को उम्मीदवार नहीं बनाया था. RLM के बीजेपी में विलय से इनकार करने की वजह से उनका नाम उस सूची में शामिल नहीं किया गया. इससे उनके मंत्री पद पर बने रहना मुश्किल होता जा रहा था.
अब बीजेपी ने खुद दिलाई राहत
सुप्रीम कोर्ट में अगस्त के आखिरी सप्ताह में सुनवाई से पहले बीजेपी ने अपने एक एमएलसी से इस्तीफा दिलवाया. उसी खाली हुई सीट पर दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजा गया. इससे सरकार अब सुप्रीम कोर्ट में यह कह सकेगी कि दीपक प्रकाश अब सदन के सदस्य हैं.
दीपक प्रकाश के एमएलसी बनने से मामला पूरी तरह खत्म नहीं माना जा रहा. जब याचिका दाखिल हुई थी, उस समय वह विधायक या एमएलसी बने बिना ही छह महीने से ज्यादा समय तक मंत्री रह चुके थे. इसलिए कोर्ट उसी आधार पर मामले की सुनवाई जारी रखता है या नहीं, यह आगे साफ होगा.
ऐसे ही एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के एक मंत्री की नियुक्ति को बाद में असंवैधानिक और अवैध बताया था, जबकि तब तक वह सरकार भी खत्म हो चुकी थी. अगर दीपक प्रकाश के मामले में भी ऐसा फैसला आता है तो इससे उन्हें और बीजेपी दोनों को असहज स्थिति का सामना करना पड़ सकता है.
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मार्च 2027 से पहले फिर बढ़ेगा दबाव
अगर सुप्रीम कोर्ट का मामला चलता रहा तो उपेंद्र कुशवाहा पर राजनीतिक दबाव भी बना रहेगा. मार्च 2027 से पहले बीजेपी फिर RLM के विलय का मुद्दा उठा सकती है. अगर विलय नहीं होता तो दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर संकट फिर खड़ा हो सकता है. दूसरी तरफ, अगर उपेंद्र कुशवाहा पहले की तरह केंद्रीय नेतृत्व से राहत दिलाने में सफल रहे तो राजनीतिक तस्वीर बदल भी सकती है.
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