Patna News: (आनंद तिवारी की रिपोर्ट) सड़क हादसों में घायल होने वाले मरीजों की जान बचाने के लिए बिहार सरकार अब कड़े और बड़े कदम उठाने जा रही है. राज्य में ट्रॉमा सेंटरों और इमरजेंसी मेडिकल सेवाओं को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं. इसी सिलसिले में बुधवार को पटना के बापू टावर सभागार में राज्य स्वास्थ्य समिति और बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया. इस कार्यशाला में स्वास्थ्य विभाग, पुलिस विभाग और विभिन्न जिलों से आए प्रशासनिक अधिकारियों ने हिस्सा लिया और सड़क दुर्घटना के बाद पीड़ितों को ‘गोल्डन ऑवर’ (हादसे के बाद का पहला घंटा) में त्वरित व बेहतर इलाज मुहैया कराने की रणनीति पर विचार-विमर्श किया. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस शुरुआती एक घंटे में मरीज को सही इलाज मिल जाए, तो उसकी जान बचने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है.
15 दिनों में देनी होगी रिपोर्ट, स्वास्थ्य मंत्री का सख्त निर्देश
कार्यशाला को संबोधित करते हुए राज्य स्वास्थ्य समिति के प्रशासी पदाधिकारी राजेश कुमार ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग राज्य के सभी ट्रॉमा सेंटरों को आधुनिक और पूरी तरह क्रियाशील बनाने के लिए प्रतिबद्ध है. उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य मंत्री का भी स्पष्ट निर्देश है कि सभी ट्रॉमा सेंटरों का संचालन गुणवत्तापूर्ण ढंग से हो और गंभीर मरीजों को इलाज के लिए दूसरे बड़े शहरों की तरफ भटकना न पड़े.
प्रशासी पदाधिकारी ने अधिकारियों को दिया निर्देश
प्रशासी पदाधिकारी ने कहा कि ‘अगले 15 दिनों के भीतर सभी अधिकारी अपने-अपने अंचल और क्षेत्रों के ट्रॉमा सेंटरों का भौतिक निरीक्षण करें. वहां उपलब्ध मानव संसाधन, डॉक्टरों, नर्सों की संख्या, चिकित्सा उपकरणों, बेड, जीवन रक्षक दवाओं और अन्य संसाधनों की कमी को चिह्नित कर विस्तृत रिपोर्ट राज्य मुख्यालय को सौंपें, ताकि व्यवस्थाओं को तुरंत दुरुस्त किया जा सके.’
रेफरल सिस्टम में सुधार और निजी एंबुलेंस की होगी मैपिंग
राजेश कुमार ने सड़क दुर्घटना के मामलों में सुस्त रेफरल व्यवस्था पर भी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि अक्सर देखा जाता है कि मरीज को प्राथमिक केंद्र से दूसरे अस्पताल रेफर करने में कीमती समय बर्बाद हो जाता है, जो जानलेवा साबित होता है. इस समय को कम करने के लिए एक विशेष और त्वरित रेफरल प्रोटोकॉल बनाया जाएगा.
इसके अतिरिक्त, आपातकालीन स्थिति में एंबुलेंस की कमी को दूर करने के लिए राज्य में संचालित सभी निजी एंबुलेंस की डिजिटल मैपिंग की जाएगी. इससे दुर्घटनास्थल के सबसे नजदीक मौजूद एंबुलेंस को तुरंत ट्रैक कर पीड़ित तक जल्द से जल्द सहायता पहुंचाई जा सकेगी.
अस्पतालों के साथ गांव-गांव तक जागरूकता भी जरूरी: एडीजी (यातायात)
कार्यशाला में मौजूद बिहार के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (यातायात) मोहम्मद अली अंसारी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि केवल स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ा देने भर से सड़क हादसों की समस्या का पूर्ण समाधान नहीं हो सकता. दुर्घटनाओं की दर में कमी लाने के लिए ग्रामीण स्तर तक सड़क सुरक्षा और यातायात नियमों का व्यापक जागरूकता अभियान चलाना होगा.
एडीजी ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण सुझाव दिए:
- लोगों को हेलमेट पहनने, सीट बेल्ट लगाने और ओवरस्पीडिंग से बचने के लिए लगातार जागरूक किया जाए.
- सड़क दुर्घटना पीड़ितों को सरकार की ओर से मिलने वाली क्षतिपूर्ति (मुआवजा) राशि समय पर मिले, इसके लिए पुलिस और प्रशासन को मिलकर प्रयास करना चाहिए.
- राज्य के सभी क्रियाशील ट्रॉमा सेंटरों की सूची और वहां उपलब्ध सुविधाओं का डेटा जिला प्रशासन और स्थानीय पुलिस के साथ साझा किया जाए, ताकि आपातकालीन स्थिति में पुलिस घायल को बिना वक्त गंवाए सही अस्पताल पहुंचा सके.
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