Nilay Mitash Success Story : मुजफ्फरपुर के निलय मिताश ने साबित किया है कि सपनों को पूरा करने के लिए सिर्फ हुनर नहीं, बल्कि लंबे संघर्ष और धैर्य की भी जरूरत होती है. बेंगलुरु की सुरक्षित इंजीनियरिंग नौकरी छोड़कर मुंबई पहुंचे निलय ने अभिनय की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है. बैरी जॉन एक्टिंग स्टूडियो से अभिनय की ट्रेनिंग लेने के बाद उन्होंने शॉर्ट फिल्म ‘वयम’ में 10 अलग-अलग किरदार निभाकर अपनी प्रतिभा दिखाई. इस फिल्म के लिए उन्हें तीन जगह बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड मिला. अब निलय OTT ऐप ‘वेव्स’ की चर्चित सीरीज ‘हेलो... हम बोल रहे हैं’ में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं.
एक्टिंग की शुरुआत कैसे हुई?
मुझे बचपन से फिल्में देखने का बहुत शौक था, लेकिन उस समय हीरो बनने का कोई प्लान नहीं था. बेंगलुरु में नौकरी के दौरान कैंसर से मेरी मां का निधन हो गया. इस सदमे के बाद मेरा काम में मन नहीं लगता था. खुद को संभालने के लिए मैंने एक्टिंग शुरू की. धीरे-धीरे अभिनय में मुझे सुकून मिलने लगा और करीब दो साल तक थिएटर किया.
. नौकरी छोड़ने का फैसला कैसे लिया?
दो साल थिएटर करने के बावजूद नौकरी छोड़कर एक्टिंग में आने को लेकर डर था. फिर एक दिन ऑफिस जाते समय मेरा ऑटो बुरी तरह दुर्घटनाग्रस्त हो गया. उस हादसे में मैं सुरक्षित बच गया. इसके बाद मुझे लगा कि जब जिंदगी का ही कोई भरोसा नहीं है, तो अपने सपने के लिए रिस्क लेने से क्यों डरना.
. मुंबई आने के बाद क्या किया?
हादसे के अगले ही दिन मैंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया और मुंबई आ गया. यहां बैरी जॉन एक्टिंग स्टूडियो से एक्टिंग में डिप्लोमा किया और इसके बाद फुल टाइम एक्टिंग को अपना करियर बना लिया.
शुरुआती रिजेक्शन कितना मुश्किल था?
मुंबई में शुरुआत के दिनों में रिजेक्शन काफी तकलीफ देता था. घंटों धूप और पसीने में ऑडिशन के लिए लाइन में खड़े रहने के बाद कई बार कास्टिंग डायरेक्टर्स सीधे ‘नॉट फिट’ कह देते थे. जब मैं लीड रोल की इच्छा जाहिर करता था, तो कुछ लोग मजाक उड़ाते और कहते थे, ‘खुद को क्या शाहरुख खान समझ रहे हो?’
. बिहार से होने की वजह से क्या चुनौती आई?
बिहार से होने के कारण भी मुझे अलग तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा. कई ऑडिशन ग्रुप्स में ‘बिहार-यूपी लुकिंग गाय’ जैसी कैटेगरी लिखी होती थी, जिसका मतलब एक खास रंग-रूप से लिया जाता था. मेरा रंग साफ था, इसलिए कई लोग सीधे कह देते थे कि आप बिहार के नहीं लगते.
. बिहारी भाषा को लेकर क्या अनुभव रहा?
एक और चुनौती यह थी कि लोग फिल्मों में सुनाई जाने वाली बनावटी बिहारी बोली की उम्मीद करते थे. जबकि असल में बिहार में कुछ किलोमीटर के बाद ही बोलने का अंदाज और भाषा बदल जाती है. हर इलाके की अपनी बोली और लहजा है, लेकिन ऑडिशन में अक्सर एक ही तरह की बिहारी भाषा की उम्मीद की जाती थी.
सीरीज के निर्देशकों से मुलाकात कैसे हुई?
इस सीरीज के निर्देशक अभियांक और आनंद से मेरी मुलाकात एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में हुई थी. कोरोना महामारी के दौरान लॉकडाउन में दोनों मेरे घर पर रुके थे. उस दौरान हमने साथ में काफी काम किया और कई स्क्रीनप्ले भी लिखे. इसी दौरान हमारी प्रोफेशनल बॉन्डिंग मजबूत हुई.
. ‘वयम’ से कैसे मिली पहचान?
इस सीरीज से पहले मैं उनकी करीब 40 मिनट की शॉर्ट फिल्म ‘वयम’ में काम कर चुका था. इस फिल्म में मैंने अकेले 10 अलग-अलग किरदार निभाए थे. मेरे अभिनय को काफी सराहना मिली और दरभंगा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल समेत तीन जगह मुझे बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड मिला. फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के बीच भी ‘वयम’ की काफी चर्चा हुई.
. ‘हेलो... हम बोल रहे हैं’ में लीड रोल कैसे मिला?
‘वयम’ में मेरे काम और अभिनय को देखकर अभियांक और आनंद को मेरे हुनर पर भरोसा हुआ. इसी के आधार पर उन्होंने अपनी नई सीरीज ‘हेलो... हम बोल रहे हैं’ में मुझे मुख्य भूमिका देने का फैसला किया. मेरे लिए यह मौका इसलिए भी खास है, क्योंकि एक शॉर्ट फिल्म में किए गए प्रयोग ने मुझे बड़े प्रोजेक्ट में मुख्य किरदार तक पहुंचाया.
बिहार में शूटिंग का अनुभव कैसा रहा?
इस सीरीज की पूरी शूटिंग बिहार के अलग-अलग इलाकों में हुई है. मुख्य रूप से मुजफ्फरपुर, वैशाली और सारंगा दरबार गांव में शूटिंग की गई. अपने ही राज्य में काम करने का अनुभव मेरे लिए काफी खास रहा, क्योंकि यहां के माहौल और लोगों से एक अलग तरह का जुड़ाव महसूस हुआ.
. अपने दादाजी के घर शूटिंग करना कैसा लगा?
मेरे लिए सबसे भावुक पल वह था, जब सीरीज के कुछ सीन मेरे अपने दादाजी के घर और उसके पीछे की गली में फिल्माए गए. जिस जगह से मेरी कई यादें जुड़ी हैं, वहीं कैमरे के सामने एक्टिंग करना मेरे लिए बहुत खास अनुभव था. पूरे गांव के लोगों ने भी शूटिंग के दौरान हमें परिवार की तरह सहयोग दिया.
. गांव वालों के साथ सीरीज देखने का क्या प्लान है?
गांव के कई लोगों को यह तक पता नहीं था कि मैं मुंबई में एक्टिंग कर रहा हूं. इसलिए मैंने उनसे वादा किया है कि जल्द ही गांव जाऊंगा और वहां एक बड़ा प्रोजेक्टर लगाकर पूरे गांव के लोगों के साथ बैठकर यह वेब सीरीज देखूंगा. मेरे लिए यह पल किसी उपलब्धि से कम नहीं होगा.
बड़े कलाकारों के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
यशपाल शर्मा, दयाशंकर पांडे और इश्तियाक खान जैसे अनुभवी कलाकारों के साथ काम करना शानदार अनुभव रहा. ऐसे कलाकारों के साथ काम करने से बहुत कुछ सीखने का मौका मिलता है. सीरीज में यशपाल जी के साथ मेरा एक बड़ा आमने-सामने का सीन था. जब सामने इतना बड़ा कलाकार अपने पूरे फॉर्म में हो, तो आपको भी अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए पूरी तरह तैयार रहना पड़ता है.
. यशपाल शर्मा के साथ सीन के बाद क्या बदलाव आया?
यशपाल जी के साथ उस सीन को करने के बाद मेरा आत्मविश्वास काफी बढ़ा. उस अनुभव ने मुझे यह भरोसा दिया कि मैं बड़े कलाकारों के सामने भी पूरी तैयारी और आत्मविश्वास के साथ अपनी भूमिका निभा सकता हूं. मेरे लिए वह सीन अभिनय के साथ-साथ सीखने का भी एक बड़ा मौका था.
. आने वाले प्रोजेक्ट्स कौन से हैं?
फिलहाल मैं एक बड़ी फीचर फिल्म कर रहा हूं, जिसमें मैं लीड रोल में हूं. इस फिल्म में चंकी पांडे मुख्य विलेन की भूमिका में हैं. उनके अलावा ब्रजेश हिरजी, नायरा बनर्जी और दिव्या अग्रवाल जैसे कलाकार भी फिल्म का हिस्सा हैं. इसके साथ ही मेरे लिखे दो स्क्रीनप्ले पर भी फिल्म बनाने को लेकर बातचीत चल रही है.
बिहार से मुंबई आने वाले युवाओं को क्या सलाह देंगे?
मैं युवाओं से यही कहूंगा कि अपने सपने के लिए जरूर लड़ें, लेकिन एक्टिंग की दुनिया को लेकर सिर्फ कल्पनाओं में न रहें. इस रास्ते में कई मुश्किलें आएंगी और कई जगह समझौते भी करने पड़ सकते हैं. इसलिए मुंबई आने से पहले अच्छे से सोच लें कि आप क्या हासिल करना चाहते हैं और इसके लिए क्या खोने को तैयार हैं.
. क्या एक्टिंग सिर्फ एक कला है?
मेरे हिसाब से एक्टिंग सिर्फ एक कला नहीं है, बल्कि यह एक बिजनेस भी है. यहां सिर्फ टैलेंट के भरोसे लंबे समय तक टिकना आसान नहीं है. आपको इंडस्ट्री की वास्तविकता समझनी होगी और लगातार खुद को बेहतर बनाने पर काम करना होगा.
. इस सफर में सबसे जरूरी क्या है?
यहां सफलता रातों-रात नहीं मिलती. मैंने अपने 14 साल के सफर में यही सीखा है कि इस इंडस्ट्री में बने रहने के लिए सबसे ज्यादा धैर्य और लगातार मेहनत की जरूरत होती है. रिजेक्शन और मुश्किलों के बावजूद अगर आप अपने काम पर टिके रहते हैं, तो धीरे-धीरे रास्ते खुलने लगते हैं.
