भारत की ऐतिहासिक चेतना को पश्चिमी दृष्टि से नहीं आंका जा सकता : प्रेम कुमार

एएन कॉलेज के इतिहास विभाग द्वारा आयोजित ‘औपनिवेशिक, उत्तर-औपनिवेशिक भारतीय संस्थान और भारत बोध’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुक्रवार को उद्घाटन हुआ

संवाददाता, पटना एएन कॉलेज के इतिहास विभाग द्वारा आयोजित ‘औपनिवेशिक, उत्तर-औपनिवेशिक भारतीय संस्थान और भारत बोध’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुक्रवार को उद्घाटन हुआ. कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए विधानसभा के अध्यक्ष डॉ प्रेम कुमार कहा कि उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श ने पश्चिमी ज्ञान परंपरा के वर्चस्व और उसके प्रभावों को चुनौती दी है. उपनिवेशवाद समाप्त हो चुका है, पर उसकी मानसिक और सांस्कृतिक आज भी भारतीय संस्थानों और समाज पर मौजूद हैं. पश्चिमी ‘विकसित दुनिया’ के मानदंडों को बिना भारतीय ऐतिहासिक अनुभव और सांस्कृतिक संदर्भ को समझे अपनाना हमारी राष्ट्रीय चेतना के साथ न्याय नहीं करता. यूरोपीय इतिहास-लेखन ने भारत को पश्चिमी चश्मे से देखने का प्रयास किया, जबकि भारत की अपनी ऐतिहासिक अनुभूति, सांस्कृतिक स्मृतियां और जीवन-दृष्टि सर्वथा भिन्न हैं. उन्होंने कहा कि भारतीय राष्ट्रवाद और उपनिवेश-विरोधी चिंतन का आधार हमारे सांस्कृतिक मूल्य, परंपराएं, आध्यात्मिकता और सामाजिक संरचना रही हैं. डॉ प्रेम कुमार ने संगोष्ठी के आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे अकादमिक अवसर युवाओं को भारतीय ज्ञान परंपरा की गहराई से परिचित कराते हैं और उन्हें बौद्धिक आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रेरित करते हैं. कार्यक्रम में कुलपति प्रो राजेश रंजन, कुलसचिव बीपी त्रिपाठी, प्राचार्य प्रो रेखा रानी, प्राचार्य प्रो एनपी वर्मा, प्राचार्य प्रो अविनाश कुमार, सुपर्णा पटेल, इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो अरविंद, डॉ जगन्नाथ गुप्ता सहित अनेक प्रख्यात विद्वान एवं विद्यार्थी उपस्थित थे. संगोष्ठी के दूसरे दिन विभिन्न सत्रों में विषय विशेषज्ञों द्वारा शोधपत्रों का वाचन और विचार-विमर्श किया जायेगा.

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Published by: Anurag pradhan

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