Bihar chaupal-3: सरकार आयेगी, जायेगी, मगर पेपर लीक नहीं रूकेगा…, बिहार में प्रतियोगी परीक्षा का यही यथार्थ

Bihar chaupal-3: चुनावी मौसम ने राजधानी पटना को ढंक लिया है. गाड़ियों के हॉर्न से ज्यादा कानों में अब चुनावी गाने गूंज रहे हैं. सड़कों के दोनों ओर लगे बैनर और पोस्टर भांति-भांति के दावे कर रहे हैं. हर हाथ को काम देंगे.. भ्रष्टाचार मिटाएंगे.. शिक्षा में सुधार लाएंगे. गांधी मैदान की ओर जाने वाले रास्ते पर बड़े-बड़े कटआउट चमक रहे हैं. नेताजी मुस्कुराते चेहरे के साथ जनता को सुनहरे सपने दिखा रहे हैं.

Bihar chaupal-3: मनोज कुमार, पटना. बोरिंग रोड के एक कोचिंग संस्थान की सीढ़ियों पर बैठे छह छात्र इन सपनों से अलग, अपने ही यथार्थ पर चर्चा कर रहे हैं. उनकी बातचीत में चुनाव तो है,नेता भी हैं, दल भी हैं, मगर मुद्दा उनकी जिंदगी को सबसे अधिक प्रभावित करने वाला छाया हुआ था “पेपर लीक”. पेपर लीक उनके सपनों पर ऐसे पड़ता है, जैसे खौलते तेल की कड़ाही से छलक कर सीधे उम्मीदों पर गिर जाय. बात छिड़ी और दूर तक गयी.

ट्रंप से हमलोग बाद में फरिया लेंगे

अभिषेक ने सामने से गुजरते एक प्रचार वाहन की ओर देखते हुए सवाल किया- क्या इस चुनाव के बाद पेपर लीक बंद हो जायेगा ? उसके सवाल पर बाकी छात्र ठहाका मारने लगे. रजनीश ने चुटकी ली. कहा- भाई… तुम्हारा सवाल ठीक वैसे ही है जैसे ट्रंप की बात. ट्रंप साहब कल क्या बोल देंगे, शायद वह खुद भी नहीं जानते होंगे. खैर. ट्रंप से हमलोग बाद में फरिया लेंगे. अभी अपना मुद्दा देखना है.

सदन के स्थायी सदस्य बन चुका है पेपर लीक

रजनीश ने आगे कहा- पेपर लीक सदन के स्थायी सदस्य की तरह हो गया है. सत्ता में कोई भी आये, पेपर लीक की जगह फिक्स हो गयी है. दीपा ने दीवार पर चिपके एक पोस्टर की ओर इशारा कर कहा- यहां रोजगार का वादा है. वहां भ्रष्टाचार मिटाने का नारा है. लेकिन कहीं नहीं लिखा है कि प्रतियोगी परीक्षाएं पारदर्शी होंगी. प्रीति ने हंसते कहा- घोषणा पत्र में चांद पर उद्योग लगाने तक की बात मिल जायेगी. इतना नौकरी दिये, उतना नौकरी दिये, हम दिये… ऊ नहीं दिये… हमही देगे… ये सब सुनने और पढ़ने को मिलेगा. लेकिन, पेपर लीक बंद होगा, ये आवाज कान नहीं सुन रहा है. बात ये है… सरकार आयेगी, जायेगी, मगर पेपर लीक नहीं रूकेगा.

हम त जनरल कैटेगरी से हैं

सुमित अलग ही परेशान था. उसकी अलग ही परेशानी थी. मित्र मंडली में वह सबसे अधिक उम्र का था. पेपर लीक चर्चा में वह थोड़ी देर से शामिल हुआ. एकदम परेशान मुद्रा में बोला- अरे यारों… शुभ-शुभ बोलो. हम त जनरल कैटेगरी से हैं. मेरी उम्र अब परीक्षा देने के अंतिम पायदान पर है. इस बार यदि पेपर लीक हुआ तो हम अब सरकारी नौकरी का फॉर्म भी नहीं भर पायेंगे. माहौल गमगीन हो गया था.

इहे सब परेशानी का जड़ है

तभी अमित बोला- ई मोबाइल देख रहे हैं. इहे सब परेशानी का जड़ है. प्रीति बोली कैसे ? अमित- इहे मोबाइल से पेपर का वाट्सएप संस्करण मालधनी बाबुओं के पास पहुंच रहा है. एक तरह से सरकारी योजना के तहत चिह्नित लाभुकों को इसका फायदा दिया जा रहा है. पेपर को सेलेक्टेड कंडीडेट के मोबाइल पर डायरेक्ट बेनीफिट ट्रांसफर योजना (डीबीटी) के तहत टपकाया जाता है. और फिर.. भंडाफोड़ होने पर योजना की प्रशासनिक स्वीकृति नहीं होने का कारण बताकर परीक्षा कैंसिल कर दी जाती है.

अगर वादा करेंगे तो मजाक ही लगेगा

अमित लंबा बोल गया था. अब विवेक गुस्से से मैदान में उछला. गजबे करते हैं अमित भाई. सरकार पेपर लीक आसानी से मानती कहां है. पेपर लीक स्वीकरवाने के लिए हड़ताली मोड़ पर धरना देना पड़ता है. लाठी खानी पड़ती है. बाकि और क्या-क्या होता है आपसे छिपा थोड़े है. रजनीश ने दूसरी बार बहस में इंट्री मारी. मुस्कुराते हुए कहा-अगर कभी किसी पार्टी ने घोषणा पत्र में लिख दिया कि पेपर लीक बंद होगा, तो लोग इसे मजाक ही समझेंगे.

इस पर बहस तब बेकार है

अभिषेक ने कहा- और अगली सुबह अखबार की सुर्खी यही होगी. ‘प्रश्नपत्र लीक’ दीपा ने मोबाइल में टाइम देखते हुए कहा- मतलब यह ऐसा मुद्दा है, जो कभी चुनावी नहीं हो सकता. इस पर बहस तब बेकार है. शाम ढल गयी थी. सुमित एकदम अकबका कर बोला- चला जाय. हमरा मकान मालिक बहुत टेढ़िया है. देर से जाने पर बहुत किच-किच करता है. यह सुनकर सभी सुमित की ओर देखने लगे औ आगे बढ़ गये. जैसे.. सभी के मकान मालिक भी सुमित के मकान मालिक की तरह ही हों.

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लेखक के बारे में

By Ashish Jha

डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों का अनुभव. लगातार कुछ अलग और बेहतर करने के साथ हर दिन कुछ न कुछ सीखने की कोशिश. वर्तमान में बंगाल में कार्यरत. बंगाल की सामाजिक-राजनीतिक नब्ज को टटोलने के लिए प्रयासरत. देश-विदेश की घटनाओं और किस्से-कहानियों में विशेष रुचि. डिजिटल मीडिया के नए ट्रेंड्स, टूल्स और नैरेटिव स्टाइल्स को सीखने की चाहत.

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