शायरी अगर दिल की बात को बिना किसी बनावट के शब्द दे दे, तो वह सीधे पाठक के मन तक पहुंचती है. आनंद कौशल का पहला ग़ज़ल एवं शायरी संग्रह ‘हमनशीं’ इसी सहज एहसास की किताब है. संग्रह में मोहब्बत, जुदाई, इंतजार, तन्हाई और उम्मीद जैसे भावों को सरल भाषा में अभिव्यक्त किया गया है. खास बात यह है कि रचनाओं को पढ़ते हुए कहीं ऐसा नहीं लगता कि भावों को जबरन शब्दों में ढाला गया है. अधिकांश ग़ज़लें जीवन के उन अनुभवों से जुड़ी नजर आती हैं, जिन्हें आम इंसान अपने जीवन में कभी न कभी महसूस करता है.
‘हमनशीं’ की भाषा इसकी सबसे बड़ी विशेषताओं में शामिल है. शायर ने कठिन शब्दों और जटिल अभिव्यक्तियों से बचते हुए ऐसी भाषा चुनी है, जिसे सामान्य पाठक भी आसानी से समझ सकता है. यही वजह है कि कई शेर पढ़ते ही मन में उतर जाते हैं और लंबे समय तक याद रहते हैं.
मोहब्बत और जुदाई के एहसासों को मिली आवाज
संग्रह में प्रेम को सिर्फ खूबसूरत एहसास के रूप में नहीं, बल्कि उसके साथ जुड़े इंतजार, बेचैनी और दर्द के साथ भी पेश किया गया है. इसी भाव को एक ग़ज़ल में शायर इस तरह सामने रखते हैं,
अपनी उल्फत के वो नगमात मिले, मिलना चाहा था मगर बीच में दीवार मिले..... आ के बैठे ही थे महफिल में, के बेजार उठे, हमसे पहले भी तो, साकी के तलबगार मिले.... माना दुनिया में है खुदगर्ज-ओ-बेवफा ही नहीं, माना हर गाम पर इन्सां भी खुद्दार मिले घर से निकले थे वो दामन को बचाकर अपने उन पर ही इल्जाम के छीटें सरे बाजार मिले बाद मुद्दत के यह “कौशल” है होश में आये गो जिंदगानी में ठोकर ही बार-बार मिले
इस ग़ज़ल में प्रेम के साथ जिंदगी के अनुभवों की तल्खी भी दिखाई देती है. मोहब्बत की राह में आने वाली दूरी, रिश्तों की उलझन और समाज के व्यवहार को शायर ने अपने अंदाज में पिरोया है.
इसी तरह एक अन्य शेर में प्रेम की जटिलता को बेहद सरल शब्दों में कहा गया है,
“ये करम मुझपर तेरी चाहतों का रहा, कभी ओस से बुझी प्यास तो कभी दरिया ने भी प्यासा रखा।”
‘ओस’ और ‘दरिया’ जैसे बिंबों के जरिए प्रेम में मौजूद संतुष्टि और अधूरेपन को एक साथ महसूस कराया गया है. कहीं छोटी-सी उम्मीद राहत देती है, तो कहीं बहुत कुछ मिलने के बाद भी मन की प्यास बनी रहती है.
खोकर भी पाने की उम्मीद
आनंद कौशल की शायरी में प्रेम के साथ उम्मीद का भाव भी लगातार दिखाई देता है. एक शेर में वह लिखते हैं,
“तुझे हासिल करने की ऐसी ज़िद रही, तुझे खो कर भी पाने की उम्मीद रही।”
इन पंक्तियों में प्रेम की दृढ़ता और समर्पण साफ नजर आता है. किसी को पाने की चाह, उसे खो देने का दर्द और फिर भी उम्मीद बनाए रखना, इन दो पंक्तियों में समा जाता है.
इंतजार और तन्हाई के भाव भी संग्रह में कई जगह दिखाई देते हैं,
“जला रखा हूँ दीपक तेरे आने की चाहत लिए, जलाना दिल न पड़े, तेरे न आने की सूरत में....”
यहां इंतजार सिर्फ किसी के आने की उम्मीद नहीं, बल्कि उसके न आने के डर से भी जुड़ा है. यही भाव ग़ज़ल को भावनात्मक गहराई देता है.
तन्हाई से निकलकर समाज तक पहुंचती है शायरी
‘हमनशीं’ को केवल प्रेम और विरह का संग्रह कहना इसके दायरे को सीमित करना होगा. आनंद कौशल ने अपनी रचनाओं में सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर भी टिप्पणी की है. आम आदमी की रोजमर्रा की मुश्किलों को उन्होंने इन पंक्तियों में जगह दी है,
“मुश्किलें हज़ार हैं दो जून रोटी की जुगाड़ में....., कितनी उम्मीदों को हर रोज देखता हूँ कबाड़ में....”
इन पंक्तियों में आर्थिक संघर्ष और टूटती उम्मीदों की तस्वीर दिखाई देती है. शायर का ध्यान सिर्फ अपने निजी अनुभवों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह समाज में मौजूद परेशानियों को भी महसूस करता है.
राजनीति पर उनका अंदाज व्यंग्यात्मक भी हो जाता है,
“ये राजनीति का चरित्र है..... बोल और कृत्य विचित्र है.....”
कम शब्दों में कही गई ये पंक्तियां राजनीतिक कथनी और करनी के बीच के अंतर पर सवाल खड़ा करती हैं.
सरल भाषा में गहरी बात कहना बनी पहचान
‘हमनशीं’ की रचनाओं में सहजता के साथ भावनाओं की गहराई दिखाई देती है. आम तौर पर सरल भाषा में गहरे एहसासों को प्रभावी तरीके से व्यक्त करना चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन आनंद कौशल की शायरी में यह संतुलन नजर आता है.
“अश्कों को दामन में छिपाये बैठा सारी रात, शहरों को यूँ वीरानियों में डूबते देखा था...”
इन पंक्तियों में निजी पीड़ा के साथ आसपास की वीरानी का एहसास भी जुड़ जाता है. यही संवेदनशीलता संग्रह को सिर्फ प्रेम की शायरी तक सीमित नहीं रहने देती.
कुल मिलाकर ‘हमनशीं’ प्रेम, विरह, इंतजार, तन्हाई, उम्मीद और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी भावनाओं का संग्रह है. इसकी भाषा सहज है और अभिव्यक्ति सीधे पाठक से संवाद करती है. संग्रह की कई रचनाओं में ऐसे भाव मिलते हैं, जिनसे पाठक खुद को जोड़ सकता है.
शायरी और ग़ज़ल पसंद करने वाले पाठकों के लिए ‘हमनशीं’ इसलिए खास हो सकती है, क्योंकि इसमें मोहब्बत के साथ जिंदगी की सच्चाइयों की भी झलक मिलती है. आनंद कौशल को उनकी इस मर्मस्पर्शी कृति के लिए बधाई और शुभकामनाएं.
मधुप मणि “पिक्कू” पत्रकार, लेखक सह महासचिव, डब्ल्यूजेएआई
