पटना : घरेलू गैस सिलिंडर फटने पर इंडियन ऑयल को जुर्माना

पटना : राज्य उपभोक्ता फाेरम ने घरेलू गैस सिलिंडर फटने पर होने वाले आर्थिक नुकसान के लिए इंडियन ऑयल कंपनी को न्यूनतम ढाई लाख रुपये का जुर्माना देने का आदेश दिया है. फोरम के अध्यक्ष जस्टिस एसपी सिंह और सदस्य रेणु सिन्हा की संयुक्त बेंच ने कहा कि कंपनियों को गैस सिलिंडर फटने की जिम्मेदारी […]

पटना : राज्य उपभोक्ता फाेरम ने घरेलू गैस सिलिंडर फटने पर होने वाले आर्थिक नुकसान के लिए इंडियन ऑयल कंपनी को न्यूनतम ढाई लाख रुपये का जुर्माना देने का आदेश दिया है. फोरम के अध्यक्ष जस्टिस एसपी सिंह और सदस्य रेणु सिन्हा की संयुक्त बेंच ने कहा कि कंपनियों को गैस सिलिंडर फटने की जिम्मेदारी हर हाल में लेनी होगी. वे इससे नहीं भाग सकते कि उपभोक्ता का सीधा उनसे कोई संबंध नहीं है.
फोरम ने इस पर व्यवस्था भी दी है कि उपभोक्ताओं को कंपनी से हर्जाना दिलाने की पूरी कार्रवाई डीलर को करनी चाहिए. यह फैसला रोहतास निवासी डॉ जितेंद्र प्रसाद सिंह विरुद्ध नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के मामले में आया है. आदेश में लिखा है कि शिप्रा इंडेन सर्विस गैस कंपनी उपभोक्ता के पक्ष में सीधे तौर पर भुगतान और अवार्ड पारित कराये.
इस मामले में इंश्योरेंस कंपनी ने उपभोक्ता को यह कह कर क्लेम देने से मना कर दिया था कि वह गैस सिलिंडर के इंश्योरेंस से सीधे तौर पर उपभोक्ता से करार नहीं किया है. बेंच ने उसके इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया. उपभोक्ता के घर एलपीजी गैस सिलिंडर 19 नवंबर, 2016 को हुआ था. गैस सिलिंडर की आपूर्ति ठीक चार दिन पहले ही हुई थी.
गलत उम्र बताने के आधार पर बीमा के दावे को नकारा नहीं जा सकताइधर, पटना जिला उपभोक्ता फाेरम ने भी एक अहम फैसला दिया है. फैसले में उसने टिप्पणी की है कि गलत उम्र बताने के आधार पर बीमा के किसी भी दावे को अस्वीकृत नहीं किया जा सकता है. उसके नामित को हर हाल में दावे के आधार पर बीमा का भुगतान करना होगा. इस तरह के आधिकारिक विचार के आधार पर जिला उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष सुबोध कुमार श्रीवास्तव, सदस्य करिश्मा मंडल और अनिल कुमार सिंह की संयुक्त बेंच ने हाल ही में फैसला दिया है.संयुक्त बेंच का यह फैसला मनोरमा देवी विरुद्ध चेयरमैन बजाज एलियांस कंपनी लिमिटेड और पटना स्थित शाखा प्रबंधक के मामले में आया है. तथ्यों के मुताबिक अशोक कुमार ने 25 नवंबर, 2010 को बीमा कराया था.
बीमा दो लाख रुपये का था. बीमित व्यक्ति की मौत एक साल बाद ही हो गयी. इस बीच उन्होंने अपनी वार्षिक किस्त भी जमा की थी. कंपनी ने इस आधार पर बीमा देने से मना कर दिया कि उनकी जन्म तिथि गलत थी. विभिन्न दस्तावेजों में जन्म तिथि में में अंतर था. हालांकि, फोरम ने पाया कि बीमित व्यक्ति ने इरादतन उम्र नहीं छुपायी थी.

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