पटना हाइकोर्ट ने राज्य के सरकारी अस्पतालों
के कामकाज और वहां आम लोगों के इलाज के लिए दी जा रही सुविधा पर तल्ख टिप्पणी की है. कुछ दशक पहले तक पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल की गिनती देश के टॉप अस्पतालों में होती थी. बड़े लोग भी दिल्ली से आकर यहां अपना इलाज कराते थे. मगर, हाल के दिनों में काफी बदलाव आया है.
कोर्ट ने कहा है कि सरकारी अस्पतालों की बदतर हालत के चलते यहां तैनात अधिकारी अपना इलाज राज्य के बाहर कराते हैं और इसका भुगतान बिहार सरकार को करना पड़ता है. यह नौबत तब आयी है, जब राज्य सरकार आम लोगों की सेहत को लेकर सजग है. प्रदेश में कई नये मेडिकल कॉलेज अस्पताल खोले जा रहे हैं. अस्पतालों में मुफ्त दवा दी जा रही है. अस्पतालों की पड़ताल करती प्रभात खबर की रिपोर्ट.
पीएमसीएच
ओपीडी में इलाज कराने में लग जाते हैं कई दिन
राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल पीएमसीएच में इलाज कराने में मरीजों और उनके परिजनों को खूब भाग दौड़ करनी पड़ती है. ओपीडी में इलाज करवाना हो, तो डॉक्टर को दिखाने के बाद ब्लड और रेडियोलॉजी से जुड़ी जांच का सैंपल देने और रिपोर्ट लेने में दो से लेकर सात दिन तक लग जाते हैं. सीबीसी जैसी छोटी जांच की रिपोर्ट भी कई दिनों बाद मिलती है. रेडियोलॉजी से जुड़ी जांच करवाना भी आसान नहीं होता. अल्ट्रासाउंड और एक्स-रे करवाने के लिए अगर अहले सुबह से लाइन में नहीं लगे, तो उस दिन का नंबर मिलना मुश्किल है. ऐसे में दूसरे जिले से आने वाले मरीज यहीं ठहर जाते हैं. जाड़े की रात में ठिठुरते इन मरीजों को यहां आसानी से देखा जा सकता है.
दो बजे के बाद नहीं दिखते सीनियर डॉक्टर : पीएमसीएच के ज्यादातर डॉक्टर निजी प्रैक्टिस भी करते हैं. इस कारण उनका ध्यान क्लिनिक पर ज्यादा रहता है. दो बजे के बाद बहुत कम सीनियर डॉक्टर यहां मिलेंगे. डॉक्टर अब भी पुर्जे पर ब्रांडेड दवा लिखते हैं, जबकि स्वास्थ्य विभाग का आदेश है कि दवाओं के जेनेरिक नाम ही लिखना है. परिसर में जेनरिक दवाओं का काउंटर भी है. पीएमसीएच में इलाज कराने वाले मरीजों को कुछ दवाएं अस्पताल की ओर से नि:शुल्क मिलती हैं, लेकिन ज्यादातर उन्हें निजी दुकानों या बाहर से खरीदनी पड़ती हैं. इससे आर्थिक बोझ पड़ता है.
इमरजेंसी में इलाज नहीं आसान : पीएमसीएच की इमरजेंसी दो हिस्सों में काम कर रही है. इसमें मेडिसिन से जुड़े मरीजों को फिलहाल टाटा वार्ड में रखा जाता है. वहीं, सर्जरी समेत दूसरे विभागों के मरीजों को इमरजेंसी बिल्डिंग में रखा जाता है. दोनों जगहों में करीब 200 बेड यहां हैं. मरीज सबसे पहले तो यह समझ नहीं पाते कि उन्हें इन दोनों में से कहां जाना है. सही जगह पर पहुंचते हैं, तो कागजी प्रक्रिया पूरी करने व इलाज शुरू होने में भी काफी वक्त बीत जाता है.
तीन एजेंसियां, 200 सफाई कर्मचारी, फिर भी पीएमसीएच गंदा
साफ-सफाई की स्थिति अच्छी रहे, इसके लिए तीन भागों में बांट कर तीन एजेंसियों को इसकी जिम्मेदारी दी हुई है. यहां तीन शिफ्टों में 200 सफाई कर्मचारी काम करते हैं. फिर भी यहां गंदगी बड़ी चुनौती है.
आइ बैंक है, पर कॉर्निया नहीं
यहां आइ बैंक में ज्यादातर दिन एक भी कॉर्निया नहीं रहती है. स्थापना के बाद 13 अगस्त, 2018 को पहली बार कॉर्निया ट्रांसप्लांट किया गया था. तब से अब तक करीब 41 ट्रांसप्लांट ही हो पाये हैं.
आयुष्मान भारत योजना में फिसड्डी
आयुष्मान भारत योजना की स्थिति भी अच्छी नहीं है. यहां एक साल में करीब 900 मरीजों का ही इलाज हुआ है. रोजाना 5 से 10 मरीजों को ही इसका लाभ अभी मिल रहा है.
डाॅक्टर व पारामेडिकल स्टाफ की है भारी कमी
पीएमसीएच में हर दिन हजारों मरीजों का इलाज होता है. लेकिन, उस अनुपात में न तो डॉक्टर हैं और न ही नर्स. पारा मेडिकल कर्मचारियों की यहां भारी कमी है. यहां स्वीकृत पदों के आधे से भी ज्यादा पद खाली हैं.
आइजीआइएमएस
मरीजों के दबाव से अस्पताल परेशान
आइजीआइएमएस की स्थापना 19 नवंबर, 1983 को हुई थी. इसे दिल्ली, एम्स के तर्ज पर शुरू किया गया था. साथ ही स्थापित अन्य राज्यों के अस्पताल इसकी तुलना में काफी अागे हैं. यहां सुपर स्पेशियिलिटी इलाज की सुविधा है.
अस्पताल में हाल में कई सुविधाएं शुरू की गयी हैं, लेकिन मरीजों के अत्यधिक दबाव के कारण आइजीआइएमएस परेशान है. यहां बेड पाना ही किसी जंग जीतने से कम नहीं है. इमरजेंसी में जाने वाले बहुत कम मरीजों को ही यहां भर्ती किया जाता है. इसका कारण बेड फुल होना होता है. ऐसे में मरीज की किस्मत अच्छी हुई, तभी उसे यहां जगह मिल सकती है. आइसीयू में तो और ज्यादा मरीजों का दबाव है.
ओपीडी में भी रहती है भारी भीड़ : यहां ओपीडी में इलाज के लिए सुबह आठ बजे से ही इसके रजिस्ट्रेशन काउंटर पर लंबी लाइन लग जाती है. इतनी भीड़ रहती है कि नंबर आने में घंटों लग जाते हैं. आइजीआइएमएस में इलाज कराने वाले मरीजों को सस्ती दवा मुहैया कराने के लिए केंद्र सरकार की योजना के तहत अृमत फार्मा खोला गया था, लेकिन इसमें बहुत कम दवाएं मिलती हैं.
लिवर ट्रांसप्लांट की सुविधा, पर जागरूकता की कमी : आइजीआइएमएस में लिवर ट्रांसप्लांट की सुविधा शुरू है. पहला और अंतिम ट्रांसप्लांट 26 सितंबर, 2018 को हुआ था, इसके बाद दोबारा नहीं हुआ. हालांकि, इसके पीछे जागरूकता की कमी है.
डाॅक्टर से लेकर कर्मचारियों तक की है कमी : आइजीआइएमएस में जरूरत के मुताबिक डॉक्टर, नर्स व पारा मेडिकल कर्मचारी नहीं हैं. इसके कारण डॉक्टर व कर्मी दबाव में काम करते हैं. इसके कारण काउंटरों पर मरीजों व परिजनों की लाइन देखी जा सकती है.
डॉक्टर व कर्मियों की होगी नियुक्ति : मंगल पांडेय
स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने कहा कि प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधा को दुरुस्त किया जायेगा. अगले महीने सभी सरकारी अस्पतालों के लिए 22 तरह के पारा मेडिकल कर्मियों की नियुक्ति शुरू हो जायेगी. जनता को बेहतर इलाज की सुविधा देने के लिए नये मेडिकल कॉलेज अस्पतालों की स्थापना की जा रही है. फरवरी के पहले सप्ताह से जननायक कर्पूरी ठाकुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल, मधेपुरा में इलाज का काम शुरू हो जायेगा. स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए 22 प्रकार के पारा मेडिकल स्टाफ की नियुक्ति की अधियाचना बिहार राज्य तकनीकी चयन आयोग को भेजी गयी है.
इसके अलावा सुपर स्पेशियलिटी इलाज के लिए आइजीआइएमएस में 350 अतिरिक्त बेड बढ़ाये गये हैं. इसके लिए भी आवश्यक चिकित्सक व कर्मियों की नियुक्ति की जा रही है. सरकारी अस्पतालों में 6500 पदों पर चिकित्सकों की नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही है. साथ ही राज्य में 9130 ग्रेड-ए नर्स और 169 ट्यूटर की नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही है. सरकार संवेदनशील है.
जीवनरक्षक उपकरण ही बीमार, कैसे हो उपचार
एनएमसीएच
जीवनरक्षक उपकरण ही बीमार, कैसे हो उपचार
नालंदा मेडिकल कॉलेज अस्पताल में उपचार कराने के लिए आनेवाले मरीजों की संख्या में भले ही निरंतर वृद्धि हो रही है, लेकिन जीवनरक्षक उपकरणों के बीमार रहने की स्थिति में मरीजों को बेहतर उपचार की सुविधा नहीं मिल पाती है. आॅपरेशन थियेटर में उपकरणों के स्टेरिलाइजेशन करने वाले मशीन की खराबी के कारण अक्सर आॅपरेशन टालना पड़ता है. अस्पताल में 16 ऑपरेशन थियेटर हैं. निश्चेतना विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ अशोक कुमार बताते हैं कि विभाग को दो बड़ी मशीनों की आवश्यकता है, जिसके लिए अस्पताल अधीक्षक के माध्यम से बीएमएसआइसीएल को भी लिखा गया है.
अस्पताल के मेडिसिन विभाग की आइसीयू, सर्जरी की आइसीयू, जीवनरक्षक पारा मीटर का मॉनीटर खराब है. इससे ब्लड प्रेशर, ऑक्सीजन के उपयोग की क्षमता व सांस लेने की क्षमता की जांच की जाती है. यही स्थिति कपल्स ऑक्सी मीटर व एबीजी मशीन की है. सर्जिकल आइसीयू व शिशु रोग विभाग में संचालित एनआइसीयू के उपकरण भी खराब हैं.
उपचार कराना जंग लड़ने के समान : अस्पताल में उपचार कराना या दवा पाना जंग लड़ने के समान है. यहां हर दिन 2100 से 2200 मरीज आते हैं. बढ़ती मरीजों की भीड़ व संसाधन सीमित होने से परेशानी उठानी पड़ती है.
एम्स
आठ साल बाद भी बेड के लिए जूझते हैं गंभीर मरीज
पटना एम्स में भी रोज हजारों मरीज आते हैं, जिन्हें लंबी प्रक्रियाओं से घंटों जूझना पड़ता है. सोमवार को करीब चार हजार और बाकी दिनों में करीब साढ़े तीन हजार की संख्या में नये मरीजो की भारी भीड़ यहां पहुंचती है.
स्थापना के आठ वर्षों बाद भी इमरजेंसी में एक अदद बेड के लिए गंभीर रोगों के मरीजों को जूझना पड़ रहा है. इमरजेंसी सेवा शुरू होने के बाद भी बेड की संख्या इतनी कम है कि मरीजों को पीएमसीएच, आइजीआइएमएस सहित अन्य अस्पतालों का रूख करना पड़ता है. नये मरीजों को रजिस्ट्रेशन से लेकर डॉक्टर के चेंबर तक पहुंचने में दो से तीन घंटे का वक्त लगना आम बात है.
जिन मरीजों को गंभीर रोग है, उन्हें कई तरह की जांच करवाने में ही कई दिन लग जाते हैं. वहीं, अगर एमआरआइ अल्ट्रासाउंड की जरूरत पड़े, तो कई महीनों के बाद का नंबर मिलता है. संसाधनों के अभाव में और रोजाना नये मरीजों की भीड़ को देख एम्स के अधिकारी चाह कर भी कुछ विशेष नहीं कर पाते हैं और अपने हाथ खड़े कर देते हैं.
बाहर से खरीदनी पड़ती हैं महंगी दवाएं : मरीज किसी तरह एडमिट हो भी जाते हैं, तो इलाज के लिए जरूरी दवाओं को बाहर से खरीदना बड़ी मजबूरी है. 80 प्रतिशत दवाएं एम्स परिसर में स्थित दवा दुकान में नहीं मिल पाती हैं. पटना एम्स आने वाले मरीजों को महंगे दामों पर दवाओं को बाहर से ही खरीदना पड़ता है.
