पटना : बिहार विधानसभा के अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी ने कहा कि संविधान की 10 वीं अनुसूची ने सभी पीठासीन पदाधिकारियों के अधिकार की सीमा को बढ़ा दिया है. साथ ही इससे जुड़े विवाद की गुंजाइश भी बढ़ा दी है.
वर्तमान में आवश्यकता इस बात की है कि इसके प्रक्रियात्मक कार्रवाई के लिए इसकी नियमावली में आवश्यक संशोधन किया जाये. वे गुरुवार को भारत में पीठासीन पदाधिकारियों के 79 वें सम्मेलन के दूसरे दिन संविधान की 10 वीं अनुसूची और अध्यक्ष की भूमिका विषय पर आयोजित संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे.
इस दौरान उन्होंने दसवीं अनुसूची के प्रावधानों में आवश्यक संशोधन करने के लिए लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिड़ला से पहल एवं अगुआई करने का अनुरोध किया. उन्होंने कहा कि इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं है. इस काम को विधायिका को ही करना है.
इस सम्मेलन में इस पर विमर्श के लिए स्वीकृत करने के लिए उन्होंने लोकसभा के अध्यक्ष को धन्यवाद दिया. उन्होंने कहा कि आज के हालात में इस कानून की पृष्ठभूमि में अध्यक्ष का निर्णय विवाद के घेरे में आने की आशंका रहती है. कभी अध्यक्ष के द्वारा निर्णय करने या निर्णय को विलंब से करने और कभी न्यायालय के द्वारा प्रतिकूल टिप्पणी के कारण. अभी हाल में कर्नाटक की घटना में अध्यक्ष द्वारा सदस्यों के इस्तीफा पर निर्णय नहीं लिया जाना और उसे दल बदल के तहत अयोग्य घोषित करना विवाद का कारण बना. हालांकि, इस पर न्यायालय द्वारा कोई स्पष्ट निर्णय नहीं आया है.
यह मामला भविष्य के लिए भी विवाद का विषय बन सकता है. आवश्यकता इस बात की है कि इस्तीफा स्वीकार करने की समय -सीमा जैसे विषय दल परिवर्तन नियमावली में स्पष्ट रूप से परिभाषित रहे.
इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि सभी पीठासीन पदाधिकारी 10 वीं अनुसूची के तहत अध्यक्ष को दिये गये अधिकारों को परिभाषित करने का निर्णय करें.
