विधानसभा से बिहार माल और सेवा कर अधिनयिम संशोधन विधेयक, 2019 पास
पटना : राज्य सरकार ने व्यापारियों को जीएसटी रजिस्ट्रेशन में बड़ी राहत देने जा रही है. अब 40 लाख से अधिक टर्नओवर वाले कारोबारियों और निर्माताओं को ही जीएसटी के लिए निबंधन कराना अनिवार्य होगा.
इसके पहले यह राशि 20 लाख रुपये निर्धारित थी. मंगलवार को उपमुख्यमंत्री सह वित्त मंत्री सुशील कुमार मोदी ने विधानसभा में बिहार माल और सेवा कर अधिनयिम संशोधन विधेयक, 2019 पेश किया, जिसे ध्वनिमत से पारित कर दिया गया. अब यह विधेयक बुधवार को विधान परिषद में पेश किया जायेगा. विधानसभा में इसे पेश करते हुए वित्त मंत्री श्री मोदी ने कहा कि जीएसटी परिषद की सिफारिशों के आलोक में राज्य सरकारों द्वारा अधिनियम में संशोधन के बाद एक जनवरी, 2020 से इसे लागू किया जायेगा. उन्होंने कहा कि जीएसटी एक राष्ट्रीय प्रणाली है.
इसके तहत केंद्रीय माल और सेवा कर अधिनियम में किये गये किसी भी संशोधन के आलोक में बिहार माल और सेवा कर अधिनियम 2017 में संशोधन किया जाना जरूरी है. इस विधेयक के लागू हो जाने के बाद सभी तरह के सेवा प्रदाताओं को 50 लाख रुपये तक टर्नओवर के बाद भी कंपोजिशन लेवी का लाभ मिल सकेगा. इसके लिए पूर्व की तरह तीन महीने में कर का भुगतान करना होगा. इसी तरह एक अप्रैल, 2020 से लागू होने वाली रिटर्न फाइलिंग को भी तीन महीने पर दाखिल किया जा सकेगा.
समाधान योजना में 31 दिसंबर तक आये विवादों का िनबटारा
उपमुख्यमंत्री ने सदन को बताया कि एकमुश्त कर समाधान योजना के तहत 31 दिसंबर तक आये विवादों को सुलझाया जा सकेगा. राज्य सरकार तीन माह की अवधि बढ़ा भी सकती है. उन्होंने बताया कि 35% के भुगतान पर किसी भी स्तर के विवाद का एकमुश्त निबटारा किया जा सकेगा.
इसके तहत करदाता द्वारा समाधान राशि से अधिक का भुगतान कर दिया जायेगा तो वह राशि वापस नहीं होगी. श्री मोदी ने कहा कि बकाया वसूली की लंबी न्यायिक प्रक्रिया से बचने के लिए सरकार ने एकमुश्त कर समाधन संशोधन विधेयक, 2019 लाया है. विधेयक के प्रावधान के मुताबिक ब्याज या पेनाल्टी या देर से जमा राशि तथा मोबाइल चेकिंग द्वारा पकड़े जाने पर जुर्माने की मात्र 10% राशि का भुगतान हो सकेगा.
इलेक्ट्राॅनिक क्रेडिट लेजर सिस्टम से भुगतान
श्री मोदी ने कहा कि सरकार डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देगी. इसके तहत इलेक्ट्राॅनिक क्रेडिट लेजर सिस्टम से भुगतान किया जा सकेगा. इस सिस्टम से किये गये भुगतान पर ही ब्याज की गणना की जायेगी. राष्ट्रीय स्तर पर अपीलीय प्राधिकार के प्रावधान भी किये गये हैं.
