पटना से सुबोध कुमार नंदन की रिपोर्ट
Patna Banking History : पटना में आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था की शुरुआत वर्ष 1862 में हुई, जब बैंक ऑफ बंगाल ने यहां अपनी पहली शाखा स्थापित की. यह केवल बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे पूर्वी भारत की बैंकिंग यात्रा का एक महत्वपूर्ण अध्याय था. आज जिस विरासत को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया आगे बढ़ा रहा है, उसकी नींव करीब डेढ़ शताब्दी पहले रखी गई थी.
- बैंक ऑफ बंगाल ने पटना में खोली थी पहली आधुनिक बैंक शाखा.
- 1969 में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने बैंक ऑफ बिहार की 48 शाखाओं का किया अधिग्रहण.
- इंपीरियल बैंक में खाता खोलना कभी प्रतिष्ठा और सामाजिक हैसियत का प्रतीक माना जाता था.
1860 में लिया गया था शाखाएं खोलने का फैसला
वर्ष 1860 में बैंक ऑफ बंगाल के निदेशक मंडल ने पहली बार विभिन्न शहरों में शाखाएं खोलने का प्रस्ताव पारित किया. जिन शहरों का चयन किया गया उनमें पटना, अमृतसर, मुल्तान, सागर (जबलपुर), मिर्जापुर, ढाका और रंगून शामिल थे. उस समय ढाका को छोड़कर इन शहरों में कोई आधुनिक बैंक नहीं था.
बैंक की 1862 की अर्द्धवार्षिक रिपोर्ट में तीन महत्वपूर्ण निर्णय दर्ज किए गए थे. इनमें जनरल ट्रेजरी व्यवस्था समाप्त करना, कागजी मुद्रा की शुरुआत करना तथा मिर्जापुर, बनारस, ढाका और पटना में नई शाखाओं का उद्घाटन शामिल था.
नील उत्पादकों और व्यापारियों से शुरू हुआ कारोबार
पटना शाखा खुलने के बाद तिरहुत क्षेत्र के इंडिगो प्लांटर्स, स्थानीय व्यापारियों और रेलवे अधिकारियों के सहयोग से बैंक का कारोबार शुरू हुआ. शुरुआती वर्षों में बिल डिस्काउंटिंग शाखा के व्यवसाय का मुख्य आधार रही.
पटना शाखा के पहले एजेंट (वर्तमान शाखा प्रबंधक) डब्ल्यू. एफ. फ्रेजर थे, जिन्होंने 26 जनवरी 1866 से 16 जुलाई 1867 तक कार्य किया. वर्तमान में इस ऐतिहासिक शाखा के सहायक महाप्रबंधक अमित कुमार सिन्हा हैं. वर्ष 1862 से 2021 तक इस शाखा में 97 शाखा प्रबंधक अपनी सेवाएं दे चुके हैं.
मुजफ्फरपुर शाखा की योजना कई वर्षों तक टली
वर्ष 1869 में हैदराबाद शाखा खुलने के बाद मुजफ्फरपुर में शाखा खोलने का प्रस्ताव रखा गया, लेकिन उपयुक्त एजेंट नहीं मिलने के कारण इसे स्थगित कर दिया गया. वर्ष 1872 में पटना शाखा की उपशाखा के रूप में इसे खोलने की योजना बनी, लेकिन अपेक्षित व्यावसायिक सफलता नहीं मिलने के कारण इसे फिर टाल दिया गया.
बांकीपुर में बना स्थायी बैंक परिसर
शुरुआत में बैंक की शाखा बांकीपुर के सिविल लाइंस क्षेत्र में किराये के भवन में संचालित होती थी. वर्ष 1864 में इसे दो मंजिला ईंट की इमारत में स्थानांतरित किया गया. करीब 12 एकड़ क्षेत्रफल वाली यह संपत्ति भारतीय सेना के सर्जन डॉ. जॉन सदरलैंड से 20 हजार रुपये में खरीदी गई थी. बाद में बैंक ने इस भूमि के जमींदारी अधिकार भी खरीद लिए. विशाल परिसर के कारण यह शाखा लंबे समय तक पटना की सबसे प्रमुख बैंकिंग इकाइयों में गिनी जाती रही.
1934 के भूकंप के बाद बना नया भवन
जनवरी 1934 के बिहार-नेपाल भूकंप में शाखा भवन और एजेंट का आवास बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया. इसके बाद एजेंट के लिए करीब 42,280 रुपये की लागत से नया आवास बनाया गया और अक्टूबर 1936 में इसका उपयोग शुरू हुआ.
वहीं पुराने भवन के स्थान पर बांकीपुर मैदान के पश्चिमी हिस्से में करीब 1.35 लाख रुपये की लागत से नया कार्यालय भवन बनाया गया, जो नवंबर 1938 में तैयार हुआ. तत्कालीन एजेंट एल. डब्ल्यू. वुडवर्ड ने इसे इंपीरियल बैंक के अनुरूप भव्य भवन बताते हुए बिहार की श्रेष्ठ इमारतों में शामिल किया था. निर्माण के लिए धन जुटाने को वर्ष 1937 में परिसर की अतिरिक्त भूमि के दो भूखंड बेचे गए, जिनमें लगभग 6.5 बीघा जमीन पटना जेसुइट मिशन सोसाइटी को दी गई.
इंपीरियल बैंक से स्टेट बैंक ऑफ इंडिया तक
वर्ष 1921 में बैंक ऑफ बंगाल, बैंक ऑफ बॉम्बे और बैंक ऑफ मद्रास के विलय से इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का गठन हुआ. स्वतंत्रता के बाद एक मजबूत सार्वजनिक बैंक की आवश्यकता को देखते हुए संसद ने 30 अप्रैल 1955 को कानून पारित किया और 1 जुलाई 1955 से इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का नाम बदलकर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया कर दिया.
1969 में बैंक ऑफ बिहार का हुआ विलय
बिहार का प्रमुख बैंक ‘बैंक ऑफ बिहार’ 31 मार्च 1911 को स्थापित हुआ था और इसकी शाखाएं पूरे राज्य में फैल चुकी थीं. बाद में वित्तीय स्थिति कमजोर होने पर ग्राहकों के हितों की रक्षा के लिए वर्ष 1969 में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने इसकी 48 शाखाओं का अधिग्रहण कर लिया. इसके साथ ही बिहार की बैंकिंग व्यवस्था एक नए चरण में प्रवेश कर गई.
पटना सिटी में थी ‘पे ऑफिस’ शाखा
स्टेट बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन के महासचिव अमरेश विक्रमादित्य बताते हैं कि व्यापारिक गतिविधियों को देखते हुए इंपीरियल बैंक ने पटना सिटी के चमरदोरिया क्षेत्र में ‘पे ऑफिस’ नामक एक लघु शाखा स्थापित की थी. यहां केवल नकद लेन-देन होता था और इसका संचालन मुख्य पटना शाखा से किया जाता था.
व्यापारियों के कई गोदाम बैंक के ऋण के बदले बैंक के नियंत्रण में रहते थे. गोदामों की चाबियां बैंक के पास रहती थीं और ‘गोदाम कीपर’ नामक कर्मचारी उनकी निगरानी करते थे. उन्हीं की उपस्थिति में माल की निकासी और भंडारण होता था. उस दौर में बड़े व्यापारिक भुगतान प्रायः हुंडी और रुक्का के माध्यम से किए जाते थे. इंपीरियल बैंक के आने से संगठित बैंकिंग व्यवस्था को मजबूती मिली और व्यापारिक लेन-देन अधिक सुरक्षित एवं व्यवस्थित हुआ.
प्रतिष्ठा का प्रतीक था इंपीरियल बैंक का खाता
अमरेश विक्रमादित्य के अनुसार उस समय इंपीरियल बैंक में हर किसी का खाता नहीं खुलता था. खाता खोलने से पहले व्यक्ति की आर्थिक हैसियत, सामाजिक प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता का आकलन किया जाता था. यही कारण था कि इंपीरियल बैंक का खाताधारक होना समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था.
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