बालश्रम कानून की धज्जियां उड़ा रहे ईंट भट्ठे व होटल

अनदेखी. देश के पहले बालश्रम मुक्त प्रखंड में पहल बंद हिसुआ : देश के पहले बालश्रम मुक्त प्रखंड में बाल श्रमिकों की संख्या घटने के बजाय व बढ़ता जा रहा है. बच्चे स्कूल जाने के समय में रद्दी कागज चुनते, कोयला चुनते, होटलों, गैरेजों के साथ कई सरकारी गैर सरकारी संस्थानों में भी काम करते […]

अनदेखी. देश के पहले बालश्रम मुक्त प्रखंड में पहल बंद

हिसुआ : देश के पहले बालश्रम मुक्त प्रखंड में बाल श्रमिकों की संख्या घटने के बजाय व बढ़ता जा रहा है. बच्चे स्कूल जाने के समय में रद्दी कागज चुनते, कोयला चुनते, होटलों, गैरेजों के साथ कई सरकारी गैर सरकारी संस्थानों में भी काम करते देखे जा रहे हैं. पूर्व जिलाधिकारी एन विजयालक्ष्मी के अथक प्रयास से 16 दिसंबर 2002 में हिसुआ देश-दुनिया में चर्चा में आया. इस दिन हिसुआ देश का प्रथम व विश्व का दूसरा बालश्रमिक प्रखंड घोषित हुआ. जिलाधिकारी ने यह साहसिक कदम उठाकर न सिर्फ यह घोषणा करायी, बल्कि प्रखंड को पूर्ण रूप से बालश्रम मुक्त बनाया. उन्होंने तत्कालीन रेलमंत्री लालू प्रसाद से मिल कर सभी बाल श्रमिक बच्चों को चिह्नित कर उन्हें सरकारी विद्यालयों में मुफ्त नामांकन करवाया. विद्यालय जाने के लिए कपड़े ,भोजन व पठन -पाठन की सामग्री भी उपलब्ध कराये.
उत्साहित अभिभावक अपने बच्चों को काम से छुड़वा कर पढ़ाई के रास्ते मोड़ दिया. कई बच्चे साक्षर हो गये. विद्यालय से जुड़ कर पढ़ाई में लग गये. लेकिन, तत्कालीन जिलाधिकारी एन विजयालक्ष्मी का स्थानांतरण होने के बाद स्थिति पूर्वतः होती चली गयी. पढ़ाई में ढिलाई,सामग्री मिलना बंद हुआ, देख-रेख व निगरानी का काम भी बंद हुआ. बाल श्रमिकों का उचित व्यवस्था कम हुआ, लोग इस ओर सजग कम होते गये. गरीबी व लाचारी उन्हें पुन: बाल श्रमिक होने पर मजबूर कर दिया. आज स्थिति यह है कि आपको यहां सबसे ज्यादा बाल श्रमिक अधिनियम कानून की धज्जियां उड़ाते नजर आयेंगे. बच्चों की मजदूरी महज 50 से 100 रुपये होती है, पर इससे काम दिन रात लिया जाता है. ईंट भट्ठी पर काम कर रहे 12 वर्षीय बबलू बताता है कि मुझे सिर्फ 70 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से पैसे मिलते हैं, उसी से हम अपना काम करते है. छोटू उर्फ पगला नाम का होटल में काम करने वाले 13 वर्ष के लड़के ने कहा मैं सिर्फ सभी होटलों में पानी लाता हूं. इसके एवज में मुझे पांच रुपये प्रति बाल्टी के हिसाब से मिलता है. सुबह छह बजे ही वह होटलों में पानी भरने लग जाता है.
फिलहाल स्थिति यह है कि यहां चौक-चौराहों पर, मूंगफली, नारियल,अंडे, चाय और सब्जी बेचते हमेशा नजर आयेंगे. इनके परिजन भी कहते हैं हमारी लाचारी है, गरीबी के कारण बच्चों को भी काम करना पड़ रहा है. कई बच्चे तो दूसरे राज्यों में चले गये हैं, वे खानाबदोश जीवन बिताते हैं इससे उनके बच्चे साक्षर भी नहीं हो पाते हैं. उनके बच्चे विद्यालय नहीं देखा, कहने को तो इनके बच्चे का नामांकन यहां के स्कूलों में हैं, पर सारा लाभ शिक्षक ही उठाते हैं. यहां हम पढ़ेंगे,सबको पढ़ायेंगे,नवादा जिला को साक्षर बनायेंगे का सपना का छलावा लग रहा है. सरकार के सारे दावे फेल हो रहे हैं. तमाम कोशिशें नाकाम हो रही हैं. स्थानीय नेताओं, समाजसेवियों व बुद्धिजीवियों ने डीएम मनोज कुमार से पुन: बालश्रम उन्मूलन को लेकर फिर से कवायद तेज कर बालश्रम के प्रति एक मुहिम चलाने की अपील की है,ताकि बच्चों का बचपन न छीने व देश के भविष्य का शिक्षा उज्ज्वल हो.

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