सीतामढ़ी महोत्सव का इंतजार किसी भी तरह के महोत्सव से जिला रह जाता है वंचितककोलत महोत्सव की परिपाटी भी इस सरकार में हो गयी खत्मउपेक्षित माता सीता की शरणस्थली सीतामढ़ी की तरफ सरकार व पर्यटन विभाग की नजरें कब होगी इनायतलोगों की मांग व प्रयास के बाद भी प्रशासन व जनप्रतिनिधि नहीं करते कोई पहल फोटो- 3प्रतिनिधि, हिसुआप्रदेश में महोत्सवों का दौर चल रहा है. लगभग सभी जिलों में किसी न किसी स्थान के नाम पर महोत्सव होते ही रहते हैं, लेकिन नवादा जिले की धरती इससे वंचित है. जबकि, यहां भी महोत्सव आयोजित करने के लिए कई स्थल उपयुक्त हैं. राजगीर महोत्सव, तपोवन महोत्सव, देव महोत्सव, बोधगया महोत्सव, वैशाली महोत्सव, मिथिला महोत्सव आदि को देख इस क्षेत्र के लोगों के दिलों में भी इस तरह के महोत्सव आयोजित होने की हसरतें उठती है, लेकिन सरकार की उपेक्षा के कारण उनके अरमानों पर पानी फिर जाता है़ जिले में पूरे देश में प्रसिद्ध शीतल जलप्रपात ककोलत में पहले यह परिपाटी बनी थी. यहां महोत्सव के नाम पर सरकारी आयोजन होता था, लेकिन हाल के काई वर्षों से यह भी नहीं हो रहा है़ मेसकौर में माता सीता की शरणस्थली सीतामढ़ी में सीतामढ़ी महोत्सव आयोजित करने की मांग लगातार एक दशक से उठ रही है, पर इस पर पर्यटन विभाग की नजरें इनायत नहीं हो रही है़ सीतामढ़ी में पर्यटन के विकास की संभावनाएं खूब है़ इस पर प्रशासन व जनप्रतिनिधियों की ओर से ठोस पहल नहीं हो रहा है़ जिने के जनप्रतिनिधि भी कोरा आश्वासन देकर रह जाते हैं. इस साल भी प्रशासन तक भी यह मांग पहुंचायी गयी़ कलाकार उमाकांत बरूआ, प्रोजेक्ट कन्या इंटर स्कूल के प्रभारी मिथिलेश कुमार सिन्हा, सुमीत बाबा आदि ने इसकी अगुआई कर मांग जिला व प्रदेश के अधिकारियों तक पहुंचायी, लेकिन कोई शुभ संकेत नहीं मिल पा रहा है़ युगल किशोर सिंह, उमेश सिंह, पुरूषोत्तम सिंह, चंद्रिका प्रसाद सिंह, साहित्यकार दीनबंधु, सिद्घनाथ पांडेय, रामबालक चौहान सहित समाजसेवी और आम जन भी बराबर इसकी मांग उक्त स्थल पर जनप्रतिनिधियों के पहुंचने पर व ज्ञापनों के माध्यम से भी उठाते रहे हैं. लेकिन, पहल नहीं होने से लोगों में मायूसी है़ उपेक्षित सीतामढ़ी में संभावनाएंमाता सीता की शरमस्थली सीतामढ़ी में पर्यटन की बेहतर संभावनाएं हैं, जो ऐसी पहल से ही विकसित हो सकती है़ सीतामढ़ी से क्षेत्र के लोगों का ही नहीं, वरण दूर-दराज के लोगों का भी खूब आस्था है़ कई तथ्यों, साक्ष्यों व भौगोलिक स्थितियों से लोग इस माता सीता की शरण स्थली मानते हैं. सीता माता को जब राम ने परित्याग किया था, तो सीता यही आकर निर्वासित हुई थी़ं सीता, वाल्मीकि, लव-कुश से जुड़े कई जीवंत साक्ष्य यहां हैं. मां सीता की धरती में समाने का द्विंखित चट्टान, वाल्मीकि आश्रम, उस काल का कुंड, तालाब, सीता मंदिर, लव-कुश के कपड़े धोने के तालाब, सीता माता के नहाने का कुंड, अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े का बांधने का खूंटे का भग्नावेश सहित कई साक्ष्य हैं, जो जनमानस के आस्था में बसे हैं. तीसरी सदी पूर्व का मौर्यकालीन 16/11 फुट का प्राचीन पॉलिस चमक लिए हुए सीता मंदिर पाषाण स्थाप्त्य कला का अद्भूत नमूना अजर-अमर है़ सीता माता के मंदिर में सालों भर लोग पूजा-अर्चना करने, चढ़ावा चढ़ाने व मन्नत मांगने के लिए पहुंचते हैं. सुहागिनों में आस्था है कि उनकी मुरादें यहां पूरी होती है़ विवाह के लिए यह क्षेत्र का प्रसिद्ध धाम है़ लगनों में अच्छी संख्या में हर दिन शादियां होती है़ पूरा क्षेत्र रमणीय है़ छोटी-छोटी पहाडियों व छोटे पेड़ों के जगंलों से भरा यह इलाका प्राकृतिक सौंदर्य व अनोखी छटाओं से लैस है़ माता सीता के आश्रम के परिसर में विभिन्न जातियों के डेढ़ दर्जन से अधिक जातिय मंदिर, धर्मशालाएं व विवाह-मंडप हैं. विभिन्न जातियों के लोग अपने पूर्वजों को याद करने यहां पहुंचते हैं. अगहन पूर्णिमा से यहां बड़ा मेला लगता है. इसमें दूर-दराज के व्यापारी घरेलू उपयोग के बड़े-छोटे सामानों की दूकान लगाने पहुंचते हैं. बौद्ध सर्किट के करीबसीतामढ़ी बोधगया-राजगीर पथ एनएच 82 से मात्र नौ किलोमीटर दूर है़ एनएच से यह चारों तरफ से जुड़ा हुआ है़ हिसुआ से दो पथ व मंझवे से एक पथ से जुड़ा है, जबकि, नरहट, रजौली और गया से भी अलग-अलग पथों से जुड़ा है़ धार्मिक न्यास परिषद् के अध्यक्ष किशोर कुणाल ने इस राम-पथ में शामिल किया है़ बौद्ध सर्किट से गुजरने वाले पर्यटक एनएच 82 से काफी संख्या में गुजरते हैं. ऐसे में इसको पर्यटन के फलक पर लाने की पहल बेहतर साबित होगी.
सीतामढ़ी महोत्सव का इंतजार
सीतामढ़ी महोत्सव का इंतजार किसी भी तरह के महोत्सव से जिला रह जाता है वंचितककोलत महोत्सव की परिपाटी भी इस सरकार में हो गयी खत्मउपेक्षित माता सीता की शरणस्थली सीतामढ़ी की तरफ सरकार व पर्यटन विभाग की नजरें कब होगी इनायतलोगों की मांग व प्रयास के बाद भी प्रशासन व जनप्रतिनिधि नहीं करते कोई पहल […]
