वादों की कड़वाहट से टूटी चीनी मिल खुलने की आस

बंद मिल को चालू कराने में जनप्रतिनिधि नहीं दे रहे ध्यान चुनावी समर में दिलासा देकर भूल जाते हैं सांसद-विधायक वारिसलीगंज : वर्ष 1993 से बंद पड़ी वारिसलीगंज चीनी मिल अब चुनावी वादों में तब्दील हो गयी है. करीब ढाई दशक से लोकसभा व विधानसभा चुनावों में यह सिर्फ मुद्दा ही बनी, इसे चालू करने […]

बंद मिल को चालू कराने में जनप्रतिनिधि नहीं दे रहे ध्यान
चुनावी समर में दिलासा देकर भूल जाते हैं सांसद-विधायक
वारिसलीगंज : वर्ष 1993 से बंद पड़ी वारिसलीगंज चीनी मिल अब चुनावी वादों में तब्दील हो गयी है. करीब ढाई दशक से लोकसभा व विधानसभा चुनावों में यह सिर्फ मुद्दा ही बनी, इसे चालू करने पर पहल नहीं हुई. तमाम जीते व हारे प्रत्याशी वारिसलीगंज चीनी मिल को चालू कराने व वारिसलीगंज को अनुमंडल बनाने जैसी पुरानी मांगों को पूरा करने का दिलासा दिलाते रहते हैं.
परंतु, न तो चीनी मील खुली व न ही अनुमंडल बनाने की पहल हुई. अब तो क्षेत्रीय लोगों ने इन मांगों पर चर्चा करना भी बंद कर दिया है. प्रदेश के कद्दावर नेता रहे दिवंगत विधायक रामाश्रय प्रसाद सिंह भी इस वादे को पूरा करने में सफल नहीं हो पाये. वारिसलीगंज विधानसभा के चार बार विधायक रहे देवनंदन प्रसाद, दो बार विधायक रहे प्रदीप कुमार भी इस ज्वलंत समस्या का समाधान नहीं कर सके.
मांगें हो गयीं गुम
चीनी मिल चालू कराने की मांग करनेवाली वारिसलीगंग की जनता अब किसी भी पार्टी के कद्दावर नेता या जनप्रतिनिधि से क्षेत्र की समस्या रखने में उत्साह नहीं दिखा रही है. चूंकि, लगातार प्रयास के बाद भी इनकी समस्या यथावत बनी हुई है. वादे हैं वादों का क्या के तर्ज पर वोट लेनेवाले नेताओं से अब विश्वास उठ चुका है. ऐसी स्थिति में अब पता चल गया है कि मृतप्राय हो चुकी चीनी मिल को अब संजीवनी देनेवाला कोई नहीं है.
नजरों से भी रहा ओझल
बिहार की चहुंमुखी विकास का दावा करनेवाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नजरों से भी वारिसलीगंज की चीनी मिल ओझल होती रही है.
सबसे दुखद तो यह है कि नालंदा व नवादा की सीमा पर रही वारिसलीगंज क्षेत्र की एक भी समस्या का निबटारा नहीं हो सका. जबकि इसके पड़ोसी जिले नालंदा में विकास की गंगा बहा दी गयी.चुनावी वर्ष 2010 में स्थानीय माफीगढ़ स्थित एक सभा के दौरान अपने संबोधन में आमजनों की नारेबाजी कर चीनी मिल चालू कराने की मांग की थी. लेकिन, हामी भरने के बाद भी सीएम ने इसकी सुधि नहीं ली.
राज्य में बनी नयी सरकार से जगी उम्मीद
एमपी व एमएलए यह कह कर अपना हाथ खींच लेते रहें हैं कि केंद्र व राज्य में अलग-अलग पार्टी की सरकार है. दोनों सरकारों में तालमेल की कमी है.लेकिन, ज्योंहि सूबे में भी एनडीए गठबंधन की सरकार बनी, एक बार फिर क्षेत्रीय लोगों द्वारा चीनी मील खुलवाने की मांग की जाने लगी है.
संयोग यह भी है कि विधायक व सांसद दोनों भाजपा से हैं और दोनों सरकार भी एनडीए की ही है. ऐसे में क्षेत्रीय लोगों की उम्मीद जगना लाजमी है. देखना है कि इस बार भी चीनी मील चालू होगी या फिर वही ढाक के तीन पात वाली कहावत चरितार्थ होगी.

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