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भागलपुरी सिल्क
भागलपुरी सिल्क और बावन बूटी की बढ़ी मांग
राजधानी पटना समेत पूरे बिहार में पारंपरिक वस्त्रों की मांग लगातार बढ़ रही है. 'वोकल फॉर लोकल' अभियान के बाद स्थानीय बुनकरों के उत्पादों को नया बाजार मिला है. बिहार म्यूजियम की स्मारिका दुकान पर्यटकों के बीच आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. यहां नालंदा की प्रसिद्ध बावन बूटी खादी साड़ियां, भागलपुरी सिल्क और खादी कॉटन के वस्त्रों की अच्छी बिक्री हो रही है.
टेक्सटाइल-लेदर फैक्ट्री
मधुबनी में 400 करोड़ रुपये की टेक्सटाइल-लेदर फैक्ट्री
मधुबनी के पंडौल में 400 करोड़ रुपये की लागत से टेक्सटाइल एवं लेदर फैक्ट्री की शुरुआत की गई है. इससे करीब 12 हजार लोगों को रोजगार मिलने की संभावना है. चौथी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना के अनुसार बिहार में 7,216 हथकरघा बुनकर और 5,631 संबद्ध कर्मचारी हैं. यानी कुल 12,847 लोग इस क्षेत्र से जुड़े हुए हैं.
हस्तनिर्मित उत्पाद
मेगा हथकरघा क्लस्टर
भागलपुर में 5.28 करोड़ रुपये का मेगा हथकरघा क्लस्टर
भागलपुर में 5.28 करोड़ रुपये की लागत से मेगा हथकरघा क्लस्टर विकसित किया गया है. यहां आधुनिक डाई हाउस, डिजाइन स्टूडियो, उत्पाद विकास केंद्र और 10 ब्लॉक स्तरीय क्लस्टर स्थापित किए गए हैं. इससे बुनकरों को आधुनिक तकनीक और बेहतर उत्पादन सुविधाएं उपलब्ध हो रही हैं.
गया का पटवा टोली
गया का पटवा टोली बना वस्त्र उद्योग का सबसे बड़ा केंद्र
गया का पटवा टोली बिहार के वस्त्र उद्योग का सबसे बड़ा केंद्र है, जिसे 'बिहार का मैनचेस्टर' कहा जाता है. यहां लगभग 11 हजार पावरलूम, एक हजार औद्योगिक इकाइयां और सैकड़ों हैंडलूम संचालित हैं. यहां गमछा, बेडशीट, धोती, पीतांबरी और गद्दे के खोल का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है. यहां निर्मित वस्त्र पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा और दक्षिण-पूर्वी राज्यों तक भेजे जाते हैं. इस क्षेत्र से 35 हजार से अधिक लोगों को रोजगार मिला है.
