Bihar sharif: (कंचन कुमार) विश्वविख्यात प्राचीन नालंदा कभी ज्ञान, शिक्षा, दर्शन और साहित्य की वैश्विक राजधानी माना जाता था. यहां की धरती ने ऐसे विद्वान, शायर, साहित्यकार और पत्रकार दिए, जिन्होंने देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में अपनी पहचान बनाई, लेकिन बदलते आधुनिक दौर में अब यही नालंदा सोशल मीडिया और डिजिटल मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव के कारण अपनी साहित्यिक और बौद्धिक विरासत को बचाने की चुनौती से जूझता दिखाई दे रहा है. मोबाइल, टैबलेट, लैपटॉप और सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल ने बच्चों और युवाओं को किताबों और कलम से दूर कर दिया है. कभी पुस्तकालयों और साहित्यिक चर्चाओं के लिए प्रसिद्ध रहने वाला नालंदा अब डिजिटल स्क्रीन की चकाचौंध में अपनी पुरानी पहचान खोता नजर आ रहा है.
ज्ञान और संस्कृति की वैश्विक राजधानी रहा है नालंदा
प्राचीन काल में नालंदा केवल एक विश्वविद्यालय नहीं था, बल्कि यह ज्ञान-विज्ञान, दर्शन, साहित्य और संस्कृति का अंतरराष्ट्रीय केंद्र था. यहां चीन, जापान, कोरिया, तिब्बत और अन्य देशों से छात्र शिक्षा प्राप्त करने आते थे. नालंदा विश्वविद्यालय से निकले विद्वानों ने भारतीय ज्ञान परंपरा को विश्वभर में स्थापित किया. मध्यकालीन दौर में भी इस धरती ने कई ऐसे शायर, लेखक और बुद्धिजीवी दिए, जिन्होंने साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई.
पद्मश्री डॉ. कलीम आजिज़ ने बढ़ाया नालंदा का मान
नालंदा जिले के तेल्हारा गांव में जन्मे पद्मश्री डॉ. कलीम अहमद आजिज़ उर्दू शायरी की दुनिया का बड़ा नाम रहे. वर्ष 1989 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया था. उन्होंने मात्र 17 वर्ष की आयु में शायरी लिखना शुरू कर दिया था. उनकी पहली ग़ज़ल पुस्तक का विमोचन तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने विज्ञान भवन, नई दिल्ली में किया था.
उनका शोध इवोल्यूशन ऑफ उर्दू लिटरेचर इन बिहार उर्दू साहित्य के इतिहास में महत्वपूर्ण माना जाता है. डॉ. आजिज़ ने नालंदा की साहित्यिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया.
जाबिर हुसैन ने साहित्य और राजनीति दोनों में बनाई अलग पहचान
राजगीर के नोनही गांव में जन्मे जाबिर हुसैन हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी के प्रतिष्ठित लेखक रहे हैं. उनकी उर्दू संस्मरण पुस्तक “रेत पर खेमा” के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था.
वे बिहार विधान परिषद के सभापति और राज्यसभा सदस्य भी रहे. उन्होंने दो दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखीं और कई दुर्लभ उर्दू-फ़ारसी पांडुलिपियों का संपादन कर साहित्यिक धरोहर को संरक्षित करने का कार्य किया.
अशरफ अस्थानवी ने पत्रकारिता को दी नई पहचान
नालंदा जिले के अस्थावां में जन्मे अशरफ अस्थानवी उर्दू पत्रकारिता और लेखन जगत का चर्चित नाम रहे. उन्होंने सामाजिक, धार्मिक और ऐतिहासिक विषयों पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं. हज़रत शरफुद्दीन याह्या मनेरी और प्रोफेसर अब्दुल बारी पर लिखी गई उनकी जीवनी पुस्तकें काफी चर्चित रहीं. 2022 में उनके निधन के बाद भी पत्रकारिता और साहित्य में उनका योगदान याद किया जाता है.
बिहारशरीफ से शुरू हुई थी बिहार की हिंदी पत्रकारिता
बहुत कम लोग जानते हैं कि बिहार की हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत बिहारशरीफ से हुई थी. वर्ष 1872 में केशव राम भट्ट ने बिहार बंधु नामक अखबार का प्रकाशन शुरू किया था. यह बिहार का पहला हिंदी समाचार पत्र माना जाता है और भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में इसे एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जाता है.
प्रकाश झा ने बिहारशरीफ की कहानी को दुनिया तक पहुंचाया
प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक प्रकाश झा ने अपनी राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता डॉक्यूमेंट्री फिल्म फेसेज़ आफ्टर स्टॉर्म्स के जरिए बिहारशरीफ की घटनाओं को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया. 1980 के दशक में बनी इस फिल्म को शुरुआती दिनों में प्रतिबंध का सामना करना पड़ा, लेकिन बाद में इसे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. इस फिल्म ने बिहारशरीफ को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना दिया था.
साहित्यिक संस्थाएं बचाने में जुटीं विरासत
नालंदा की साहित्यिक परंपरा को जीवित रखने के लिए कई संस्थाएं लगातार काम कर रही हैं. नवोत्साह साहित्य संगम जैसे संगठन युवा और गुमनाम साहित्यकारों को मंच देने का प्रयास कर रहे हैं. वर्ष 2026 में राजगीर कन्वेंशन सेंटर में आयोजित नालंदा इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टिवल में देशभर के साहित्यकार, पत्रकार और बुद्धिजीवी शामिल हुए. कार्यक्रम में अजय सिंह, ओम थानवी और अजय ब्रह्मात्मज जैसी हस्तियों ने भाग लिया था.
नई पीढ़ी साहित्य से क्यों हो रही दूर
साहित्यकारों और शिक्षाविदों का मानना है कि सोशल मीडिया और डिजिटल मनोरंजन ने युवाओं की जीवनशैली पूरी तरह बदल दी है. पहले जहां मुशायरे, कवि सम्मेलन और पुस्तक चर्चाओं में युवाओं की सक्रिय भागीदारी होती थी, वहीं अब उनकी रुचि छोटे वीडियो, ऑनलाइन गेम और सोशल मीडिया कंटेंट तक सीमित होती जा रही है. स्कूलों और कॉलेजों में भी साहित्यिक गतिविधियां पहले की तुलना में कम होती जा रही हैं. इसका असर भाषा, लेखन और विचार क्षमता पर भी देखने को मिल रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा नहीं दिया गया, तो नालंदा की ऐतिहासिक साहित्यिक पहचान धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकती है. साहित्यकारों का कहना है कि पुस्तक मेले, कवि सम्मेलन, मुशायरे, वाद-विवाद प्रतियोगिता और पुस्तकालय संस्कृति को फिर से मजबूत करने की जरूरत है। साथ ही बच्चों और युवाओं को डिजिटल दुनिया के साथ-साथ किताबों से भी जोड़ना होगा.
नालंदा केवल अपने प्राचीन विश्वविद्यालय के कारण नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध बौद्धिक और साहित्यिक विरासत के कारण भी विश्वभर में पहचाना जाता रहा है. ऐसे में इस विरासत को बचाए रखना समाज और सरकार दोनों की बड़ी जिम्मेदारी मानी जा रही है.
विश्व को ज्ञान देने वाली धरती
नालंदा केवल बिहार या भारत की पहचान नहीं, बल्कि यह विश्व की सबसे प्राचीन और महान शिक्षा परंपराओं का प्रतीक रहा है. प्राचीन काल में नालंदा ज्ञान, विज्ञान, दर्शन और बौद्ध धर्म का अंतरराष्ट्रीय केंद्र माना जाता था. यहां से निकले विद्वानों ने पूरी दुनिया में भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रचार किया. आज भी नालंदा का नाम विश्व इतिहास में सम्मान के साथ लिया जाता है. समय के साथ नालंदा ने उत्थान, विनाश और पुनर्जागरण तीनों दौर देखे हैं. कभी यहां ज्ञान की ज्योति जलती थी, फिर विदेशी आक्रमणों ने इसे राख में बदल दिया, लेकिन आज आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय के रूप में इसकी गौरवशाली विरासत को फिर से जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है.
पांचवीं सदी में हुई थी नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना
प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने लगभग 427 ईस्वी में कराई थी. यह विश्वविद्यालय लगभग 600 वर्षों तक विश्व का सबसे बड़ा शिक्षा केंद्र बना रहा.
उस दौर में जब दुनिया के अधिकांश देशों में शिक्षा की व्यवस्था सीमित थी, तब नालंदा में उच्च स्तर की शिक्षा, शोध और बौद्धिक चर्चाएं होती थीं. यहां धर्म के साथ-साथ गणित, चिकित्सा, खगोल विज्ञान, दर्शन, व्याकरण और राजनीति जैसे विषयों की भी पढ़ाई होती थी. नालंदा विश्वविद्यालय की ख्याति इतनी अधिक थी कि चीन, जापान, कोरिया, तिब्बत, मंगोलिया और ईरान जैसे देशों से हजारों छात्र यहां शिक्षा प्राप्त करने आते थे. यहां लगभग 10 हजार छात्र और 2 हजार शिक्षक मौजूद थे. प्रवेश प्रक्रिया बेहद कठिन मानी जाती थी. विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर ही कठिन परीक्षा ली जाती थी और योग्य छात्रों को ही प्रवेश मिलता था. चीनी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग ने भी नालंदा में अध्ययन किया था और अपने लेखों में यहां की शिक्षा व्यवस्था और अनुशासन की प्रशंसा की थी.
नौ मंजिला पुस्तकालय था ज्ञान का महासागर
नालंदा विश्वविद्यालय का सबसे बड़ा आकर्षण उसका विशाल नौ मंजिला पुस्तकालय था. इसे रत्नोदधि, रत्नसागर और रत्नरंजक नामक तीन भागों में बांटा गया था. इस पुस्तकालय में लगभग तीन लाख हस्तलिखित पांडुलिपियां सुरक्षित थीं. धर्म, विज्ञान, आयुर्वेद, चिकित्सा, गणित और दर्शन से जुड़ी दुर्लभ पुस्तकें यहां संग्रहित थीं. यह पुस्तकालय उस समय दुनिया के सबसे बड़े ज्ञान भंडारों में गिना जाता था. 12वीं सदी के अंत में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने वर्ष 1199 ईस्वी में नालंदा विश्वविद्यालय पर हमला कर दिया. उसकी सेना ने विश्वविद्यालय और पुस्तकालय को आग के हवाले कर दिया. कहा जाता है कि पुस्तकालय में इतनी अधिक पुस्तकें थीं कि उन्हें पूरी तरह जलने में करीब तीन महीने का समय लग गया. इस हमले के बाद विश्वविख्यात नालंदा विश्वविद्यालय धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमट गया. नालंदा का विनाश केवल एक विश्वविद्यालय का अंत नहीं था, बल्कि यह भारतीय ज्ञान परंपरा को लगी एक बड़ी चोट थी.
खंडहर बने, लेकिन इतिहास नहीं मिटा
सदियों तक नालंदा के अवशेष मिट्टी और खंडहरों में दबे रहे, लेकिन इसकी ऐतिहासिक पहचान कभी समाप्त नहीं हुई. पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई में विश्वविद्यालय के कई अवशेष मिले, जिसने दुनिया को नालंदा की महानता का प्रमाण दिया. वर्ष 2016 में यूनेस्को (UNESCO) ने नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेषों को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया. इसके बाद यह स्थान वैश्विक पर्यटन और ऐतिहासिक अध्ययन का प्रमुख केंद्र बन गया. प्राचीन नालंदा की गौरवशाली परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए भारत सरकार ने कई देशों के सहयोग से राजगीर में आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की है. यह आधुनिक विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा, शोध और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का केंद्र बनता जा रहा है. यहां विभिन्न देशों के छात्र अध्ययन कर रहे हैं और एक बार फिर नालंदा विश्व शिक्षा मानचित्र पर अपनी पहचान बना रहा है.
आधुनिकता के दौर में नई चुनौतियां
आज का नालंदा तकनीकी और डिजिटल युग में प्रवेश कर चुका है. मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने शिक्षा का स्वरूप बदल दिया है. हालांकि तकनीक ने सीखने के नए अवसर दिए हैं, लेकिन किताबों और पारंपरिक अध्ययन से दूरी भी बढ़ी है. विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक नालंदा को केवल तकनीकी शिक्षा तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि यहां की प्राचीन ज्ञान, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत को भी नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है. नालंदा की कहानी केवल एक विश्वविद्यालय की कहानी नहीं, बल्कि यह भारत की बौद्धिक शक्ति, सांस्कृतिक समृद्धि और ज्ञान परंपरा का प्रतीक है. प्राचीन नालंदा ने दुनिया को शिक्षा का मार्ग दिखाया था और आज आधुनिक नालंदा उसी गौरव को फिर से जीवित करने का प्रयास कर रहा है. जरूरत इस बात की है कि नई पीढ़ी नालंदा को केवल एक ऐतिहासिक स्थल के रूप में न देखे, बल्कि इसे ज्ञान, शोध और मानवता की महान विरासत के रूप में समझे.
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