लोगों की थाली से गायब हुई दाल

बिहारशरीफ : ‘दाल-रोटी खाओं, प्रभु के गुण गाओ’ यह कहावत अब पुराने जमाने की बात हो जा रही है. महंगाई के कारण दाल तो गरीबी की थाली से पहले ही दूर हो गयी है, अब रोटी के भी लाले पड़ रहे हैं. खुले बाजार में दाल की कीमत सुन कर परेशान है. खुदरा बाजार में […]

बिहारशरीफ : ‘दाल-रोटी खाओं, प्रभु के गुण गाओ’ यह कहावत अब पुराने जमाने की बात हो जा रही है. महंगाई के कारण दाल तो गरीबी की थाली से पहले ही दूर हो गयी है, अब रोटी के भी लाले पड़ रहे हैं. खुले बाजार में दाल की कीमत सुन कर परेशान है. खुदरा बाजार में वर्तमान समय में मसूर की दाल, चना, उड़द, अरहर व मूंग की दाल खरीदने में अच्छे-अच्छे लोगों का पसीना छूट रहा है.
गरीबों की बात तो दूर है. मसूर दाल 80 से 84 रुपये किलो, चना दाल 60 रुपये, अरहर दाल 110, उड़द दाल 100 रुपये व मूंग दाल 110 रुपये किलो बिक रहा है. दाल में प्रोटीन प्रचुर मात्र में होता है. दूध की खरीदारी करने में असमर्थ लोग दाल-रोटी से शरीर का चुस्त-दुरुस्त रखते थे. दाल की आसमान छूती कीमतों ने लोगों को प्रोटीन युक्त योजना करने की मंशा पर ही पानी फेर दिया है.
पहले घर आनेवाले मेहमानों के लिए लोग अरहर की दाल-भात, साग-सब्जी व घी का इंतजाम करते थे. मेहमानों की थाली से घी तो पहले ही दूर हो चुकी थी. अब दाल भी गायब हो गये हैं. अब तो सामान्य लोग घर आये मेहमान को या तो चाय पिला कर टरका रहे हैं या फिर उन्हें खाना खिलाना जरूरी हो, तो उनकी थाली में भात-सब्जी परोसा जा रहा है.
उड़द की खिचड़ी हो गयी दुर्लभ : उड़द की खिचड़ी को सबसे सुपाच्य माना जाता है. चिकित्सक रोगियों को पथ्य के रूप में उड़द दाल की खिचड़ी खाने को हिदायत देते हैं. मगर उड़द दाल की कीमत आसमान छूने से अभिभावक अपने मरीजों को उड़द दाल की खिचड़ी की जगह चना, मसूर दाल की खिचड़ी परोस रहे हैं.
क्या कहते हैं लोग
दाल की कीमत के बारे में आम लोगों से पूछना बेकार की बात है. अब तो दाल-रोटी पर भी आफत है. आम लोगों को दाल खरीदना उसके बस की बात नहीं है. खास कर रोज कमाने खानेवाले लोगों का.
रामवृक्ष पासवान, रामचंद्रपुर
मेरा बेटा कई दिनों से बीमार था. उसकी हालत जब सामान्य हुई, तो चिकित्सक ने उसे पथ्य के रूप में उड़द की खिचड़ी बना कर देने को कहा. जब मैं उड़द की दाल खरीदने बाजार गया, तो उड़द दाल के दाम सुन कर होश उड़ गये. अंत में चिकित्सक की राय मानने के लिए मसूर दाल की खिचड़ी देनी पड़ी.
रामनंदन प्रसाद, नूरसराय
क्या कहते हैं दुकानदार
‘‘ स्थानीय स्तर पर दलहन फसलों की लगातार हो रही कमी से यह स्थिति उत्पन्न हुई है. पहले किसान अपने खाने के लिए पर्याप्त मात्र में दलहन का उत्पादन करते थे. ज्यादा उत्पादन होने पर किसान उसे बेचते थे. आज स्थिति यह हो गयी है कि किसान भी दाल खरीदने को मजबूर है. मसूर दाल 84 रुपये प्रति किलो तक बिका था, मगर इधर कीमत में नरमी आयी है.’’
प्रमोद साव, थोक विक्रेता, रामचंद्रपुर

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >