मेले का है सांस्कृतिक महत्व
अब तक प्रशासनिक तैयारी शुरू नहीं
राजगीर : राजगीर का प्रसिद्ध मकर संक्राति मेला पूरी तरह से उपेक्षित है. पर्यटन एवं तीर्थ स्थल राजगीर में अनादि काल से ही मकर सक्रांति के अवसर पर मकर मेले का अयोजन होता आ रहा है. इस मेले का धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व रहा है. 1959 में बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डा. श्रीकृष्ण सिंह ने मेले का उद्घाटन कर इसे सरकारी अमली जामा पहनाया था. इस मेले का मुख्य उदेश्य पौराणिक परंपरा को कायम रखकर अवाम में शैक्षणिक, कृषि, पशुधन एवं सरकार द्वारा प्रयोजित जनकल्याण आदि से संबंधित सूचनाओं को प्रदर्शनी एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से जनमानस तक पहुंचाना था.
मेले में फसल प्रतियोगिता, मल्ल युद्ध प्रतियोगिता, स्वास्थ्य एवं शिक्षा संबंधी चलचित्रों का आयोजन, पटना रेडियो स्टेशन कलाकारों द्वारा सांस्कृतिक महत्व संबंधित गीतों का प्रसारण किया जाता था. परंतु सरकारी उदासीनता के कारण कुछ वर्षों से इस तरह के कार्यक्रम का आयोजन नहीं किया जा रहा है. पहले यह मेला पंद्रह दिनों का हुआ करता था. बाद में सरकारी उपेक्षा के कारण यह मेला घटकर सात दिनों का रह गया. अब यह मेला घटकर महज दो दिनों का हो गया. पहले मेले का डाक भी सरकारी स्तर पर करायी जाती थी. सरकारी उदासीनता के कारण शून्य में विलीन हो रहे इस मेले के अस्तीत्व और पहचान बनाये रखने के लिए स्थानीय कुछ बुद्धिजीवियों के पहल पर बडी संगत के महंथ सुखदेव मुनी जी महाराज कुछ वर्षों तक मेला का उदघाटन किया.
बाद में पूर्व शिक्षा राज्य मंत्री सुरेन्द्र प्रसाद तरूण स्थानीय बुद्धिजीवियों के पहल पर लगातार मेला का उद्घाटन कर औपचारिकता पूरी करते रहे. विगत वर्ष राजगीर के पूर्व चेयमैन वीरेन्द्र कुमार सिंह की पहल पर मेला को पुरानी पहचान दिलाने के लिए कई तरह के कार्यक्रम का अयोजन बिना कोई सरकारी सहायता प्राप्त किये किया गया. इसमें स्थानीय लोगों युवाओं और शहर के गणमान्य लोगों व बुद्धिजीवियों नें तन मन धन से मदद की. वहीं गत वर्ष मेला का उद्घाटन करते हुए मंत्री श्रवण कुमार ने कहा था कि आगामी वर्ष सरकारी स्तर से तामझाम के साथ मेला लगाकर इसको पौराणिक पहचान दी जायेगी. परंतु इस मेले के अयोजन में मात्र चंद दिन ही अब शेष रह गया है परंतु अभी तक सरकारी स्तर पर किसी भी प्रकार कि तैयारी नही की गयी है. पिछले दिनों मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजगीर आगमन पर स्थानीय बुद्धिजीवियों ने वीरेन्द्र सिंह के नेतृत्व में मुख्यमंत्री से मिलकर मेला को पौराणिक पहचान दिलाने का मांग भी की थी.
मेला में होता था खेल तमाशा और बहुत कुछ : अनादी काल से लगते आ रहे इस मेले में लाखों लोगों की भीड़ उमडती है. जिला ही नहीं अपितु राज्य के अन्य जिलों से भी बडी संख्या में लोग यहां मेले का आंनद लेने और कुंड स्नान कर धार्मिक लाभ लेने के लिए आते हैं. लोगों के मनोरंजन के लिए मकर मेले के दौरान यहां कई खेल तमाशा, जादूगर, झूले , मीना बाजार, थियेटर, आदि लगाये जाते थे. सैकडों की संख्या में छोटे-छोटे होटल ,चाय पान की दुकानों के अलावा खिलौने की दुकानें खोली जाती थीं. सरकारी उदासीनता के कारण उचित व्यवस्था और सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं.
