पोसंडा में श्रमदान से सड़क निर्माण

मुहिम. सड़क के लिए मंत्री, सांसद, विधायक से गुहार लगाते थक गये ग्रामीण सब्र का बांध टूटा तो ग्रामीणों ने श्रमदान का खुद ढूंढा रास्ता हिलसा : सरकार कहती है कि सूबे में सड़कों का जाल बिछ रहा है. हर गांव को पक्की सड़क से जोड़ने की बात कहते प्रदेश सरकार नहीं थक रहे हैं. […]

मुहिम. सड़क के लिए मंत्री, सांसद, विधायक से गुहार लगाते थक गये ग्रामीण

सब्र का बांध टूटा तो ग्रामीणों ने श्रमदान का खुद ढूंढा रास्ता
हिलसा : सरकार कहती है कि सूबे में सड़कों का जाल बिछ रहा है. हर गांव को पक्की सड़क से जोड़ने की बात कहते प्रदेश सरकार नहीं थक रहे हैं. जबकि उनके ही गृह जिला में 12 सौ आबादी वाला एक गांव ऐसा है, जहां आजादी के बाद भी अब तक सड़क बनाना तो दूर संपर्क रास्ता का भी निर्माण नहीं किया जा सका. ग्रामीणों द्वारा मंत्री, सांसद विधायक से गुहार लगाते लगाते थक गये, लेकिन मिला तो सिर्फ आश्वासन. सब्र का बांध जब टूटा तो निराश ग्रामीणों ने उठाया फावड़ा और कुदाल देखते ही देखते श्रमदान से करीब तीन किलोमीटर की सड़क निर्माण कर आने जाने का रास्ता खुद निकाल लिया.
बताया जाता है कि हिलसा शहर से महज तीन किलोमीटर पर स्थित पोसंडा गांव जहां करीब 15 सौ की आबादी है. सड़क नहीं होने के कारण गाड़ी तो छोडि़ये लोगों को पैदल चलना भी मुश्किल हो गया है. इस बरसात के मौसम में आफत जैसा बन गया है. गांव में किसी की तबीयत खराब होने पर किसी तरह खटिया पर लेकर अस्पताल तक पहुंचे है. खासकर इस मौसम में स्कूली बच्चों को पूरी तरह से पढ़ाई ठप रह जाती है. सड़कों के लिए ग्रामीण कई बार चुनाव के समय वोट बहिष्कार करने का भी काम किया था. ताकि नेताओं की नजर इस गांव के ग्रामीणों की समस्या को दूर किया जा सके. बावजूद बहिष्कार करने पर बड़े बड़े नेताओं का वोट के लिये आना हुआ और सड़क बनाने का भरोसा देकर वोट भी लिये, लेकिन जीतने के बाद उन नेताओं ने इस गांव की ओर झांका भी नहीं.
कई बार ग्रामीण खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, सांसद व स्थानीय विधायक से भी गुहार लगाया. फिर भी अब तक ग्रामीणों का आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला. हर जगह से थक हार गये ग्रामीणों ने एक सामूहिक बैठक बुलाई और संपर्क रास्ता बनाने का रास्ता निकाला. गांव के प्रत्येक घर से चंदा उगाही किया और श्रमदान कर तीन किलोमीटर जर्जर संपर्क पथ को निर्माण कर विकास पुरुष कहने वाली सरकार के मुंह पर तमाचा ही नहीं बल्कि एक मिशाल कायम किया है.
जर्जर होने के कारण हादसे का शिकर हो गये ग्रामीण:जर्जर कच्ची सड़क के कारण मरीजों व खासकर प्रसव महिला को अस्पताल ले जाने के लिए तीन किलोमीटर तक पैदल या फिर खाट का सहारा लेकर जाना पड़ता है. इस जर्जर कच्ची सड़क पर हादसे का शिकार हुए गांव के देवेन्द्र सिंह का हाथ टूट गया. जबकि रंजीत शर्मा का पैर टूट गया. हादसा बाइक से हिलसा जा के दौरान हुआ था. लगातार हुए कई हादसे के बाद ग्रामीणों ने जर्जर सड़क बनाने का मन में ठान लिया. जिसमें गांव के युवाओं की भूमिका ज्यादातर रही.
जिंदगी गुजर गया अब तक नहीं देखा सड़क:गांव के 85 वर्षीय एक बुजुर्ग परसुराम सिंह ने बताया कि इस गांव में रहे जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर पहुंच गये है. अपनी वोट से कितने विधायक और कितने सरकार को बनाया. लेकिन अब तक इस गांव में पगडंडी ही रहा. सड़क का तो नामोनिशान नहीं बना. सड़क नहीं होने से गांव की महिला एवं खासकर बच्चों को स्कूल जाने में परेशानी होती है.
क्या कहते हैं मुखिया जी
प्रतिनिधि होने के नाते गांव की विकास में हमेशा तत्पर रहा हूं. सक्षम के अनुसार करीब एक किलोमीटर तक ईंट सोलिंग का कार्य कराया. सड़क निर्माण के लिए स्थानीय विधायक से कई बार मिलकर समस्या को सुनाया, लेकिन वर्षों से सिर्फ उनके द्वारा सड़क की स्वीकृति हो जाने की बात कहीं जा रही है. सड़क नहीं होने के कारण पोसंडा समेत कई गांव के लोगों को काफी परेशानी होती है.
राजाराम पासवान, वारा पंचायत
चुनाव में ग्रामीण नेताओं से लेंगे हिसाब
इंजीनियरिंग का छात्र चंदन राज ने बताया कि प्रदेश में कितनी सरकार बनी, लेकिन उनके पूर्वजों के पहले से ही इस गांव में संपर्क रास्ता नहीं बना है. अब तक गांव के लोग पगडंडी के सहारे तीन किलोमीटर पैदल बाजार या अन्य कार्यों के लिए जाते हैं. सड़क के लिए पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी एवं वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिलकर भी गांव की समस्या से अवगत करा चुके हैं. यहां के सांसद, विधायक से कहते कहते तो थक चुके हैं, सिर्फ आश्वासन के सिवा इस गांव में विकास नाम का कोई काम नहीं किया गया है. चुनाव के समय झूठे वादा कर नेताओं ने वोट ले लेते है. लेकिन अगले चुनाव में गांव की जनता जरूर हिसाब लेगी. उन्होंने बताया कि संपर्क रास्ता नहीं होने के कारण गांव की लोगों को काफी परेशानी होती है. गांव के युवाओं द्वारा यह बीड़ा उठाया की सरकार और नेताओं की उम्मीद छोड़े इसका रास्ता खुद निकाले. बैठक कर गांव के प्रत्येक घर से चंदा उगाही किया गया और श्रमदान से सड़क का निर्माण करने में जुटे है. अब तक लगभग दो लाख रुपये की लागत लग चुकी है.

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