गंगा-जमुनी तहजीब की बात करता है प्रेमचंद का साहित्य

प्रेमचंद सिर्फ एक कथाकार ही नहीं बल्कि सोशल हिस्टोरियन भी हैं.

दीपक 26

नीतीश्वर महाविद्यालय में याद किए गये प्रेमचंद वरीय संवाददाता, मुजफ्फरपुर नीतीश्वर महाविद्यालय में हिन्दी व उर्दू विभाग के संयुक्त तत्त्वावधान में प्रेमचंद जयंती पर ‘उर्दू-हिंदी व प्रेमचंद की साझी विरासत’ विषय पर विचारगोष्ठी हुई. बतौर अतिथि बीआरएबीयू के हिंदी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ राकेश रंजन व डॉ सुशांत कुमार व बीआरएबीयू में उर्दू विभाग के प्रो हामिद अली खां के साथ ही एमडीडीएम कॉलेज के उर्दू विभाग से डॉ मोबश्शिरा सदफ उपस्थित थे. मंच संचालन शशि पासवान व धन्यवाद ज्ञापन डॉ बेबी ने किया.छात्र-छात्राओं ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति भी दी. प्रो निखिल रंजन, डॉ रविरंजन, डॉ नीतू सिंह, डॉ इन्द्राणी राय, डॉ अमरजीत, डॉ पूजा गुप्ता, डॉ रीना झा समेत अन्य मौजूद रहे.

प्रेमचंद सोशल हिस्टोरियन

प्राचार्य प्रो प्रमोद कुमार ने अतिथियों का स्वागत किया. प्रो हामिद अली खां ने पत्रों के हवाले से कहा कि प्रेमचंद सिर्फ एक कथाकार ही नहीं बल्कि सोशल हिस्टोरियन भी हैं. समाज की नब्ज पकड़ने की कला उनकी खूबी है. डॉ राकेश रंजन ने प्रेमचंद साहित्य की केन्द्रीय विषय वस्तु पर जोर दिया. कहा कि प्रेमचंद के साहित्य की केन्द्रीय चिंता भूख, उत्पीड़न, दलन, शोषण, गरीबी व अभाव है. उनकी रचनाएं इंसानियत के प्रमाणों का दस्तावेज है.

प्रेमचंद का स्त्री पात्र हर तबके का

डॉ सुशांत कुमार ने कहा कि प्रेमचंद जिन मूल्यों की स्थापना अपनी रचनाओं से करते हैं, उन्हें ठीक से जानने व समझने के लिए उनके वैचारिक निबंधों को भी देखा जाना चाहिये.डॉ मोबश्शिरा ने बताया कि प्रेमचंद के स्त्री पात्र समाज के विभिन्न तबके से आती हैं और वहां भी साझा संस्कृति का चित्रण मिलता है. प्राचार्य प्रो प्रमोद कुमार ने कहा कि प्रेमचंद का व्यक्तित्व हमें देश व समाज को अपना बेहतर देने के लिए प्रेरित करता है. विषय प्रवेश डॉ कामरान ने कराया.

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Published by: Ankit

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