Khudiram Bose Tribute: नगर परिषद स्थित साहित्य भवन में नूतन साहित्यकार परिषद द्वारा अमर क्रांतिकारी खुदीराम बोस के शहादत दिवस और राष्ट्रकवि गोपाल सिंह नेपाली की जयंती पर विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया. कार्यक्रम की अध्यक्षता परिषद के अध्यक्ष चंद्रभूषण सिंह 'चंद्र' ने की. इस अवसर पर उपस्थित साहित्यप्रेमियों ने दोनों महान विभूतियों के चित्रों पर माल्यार्पण कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की.
खुदीराम बोस की शहादत और जिंदादिली का प्रसंग
अध्यक्ष चंद्रभूषण सिंह चंद्र ने खुदीराम बोस की शहादत और उनकी अदम्य जिंदादिली को याद किया.
- मातृभूमि के प्रति निष्ठा: उन्होंने कहा कि महज 18 वर्ष की आयु में निडर मुस्कान के साथ फांसी के फंदे को चूमना यह साबित करता है कि देशप्रेम की कोई उम्र नहीं होती.
- जेल का प्रेरक प्रसंग: उन्होंने फांसी से पूर्व जेलर और आम से जुड़ा प्रसिद्ध प्रसंग सुनाते हुए बताया कि मृत्यु के मुहाने पर भी बोस के चेहरे पर तनिक भी भय नहीं था.
आग और राग के कवि थे गोपाल सिंह नेपाली
वक्ताओं ने गीतों के राजकुमार गोपाल सिंह नेपाली के साहित्यिक योगदान पर प्रकाश डाला.
- स्वाधीन कलम की ताकत: नेपाली जी की कलम आजीवन देश की स्वाधीनता और लोक-संस्कृति के लिए संघर्षरत रही.
- अमर रचनाएं: 'मेरा धन है स्वाधीन कलम' और 'तुझ सा लहरों में बह लेता' जैसी रचनाओं ने उन्हें जन-जन का प्रिय बनाया.
- त्रिवेणी संगम: आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री के अनुसार नेपाली जी में मिल्टन, कीट्स और शेली जैसी महान प्रतिभाओं का समागम था.
कार्यक्रम के अंत में कहा गया कि एक ओर जहां खुदीराम बोस ने भौतिक रूप से देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर किए, वहीं दूसरी ओर नेपाली जी ने अपनी कलम से जनमानस में आजादी की अलख जगाई. मौके पर स्वराजलाल ठाकुर, रामेश्वर महतो, महेश कुमार सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित थे.
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