विश्वविद्यालय का रहा है आपराधिक इतिहास

मुजफ्फरपुर: बीआरए बिहार विश्वविद्यालय का पुराना आपराधिक इतिहास रहा है. 1972 में कांग्रेस सुखदेव सिंह के पुत्र वीरेंद्र सिंह ने पहली बार एक हॉस्टल पर बम विस्फोट कर अपराध की शुरुआत की थी. उसके बाद विश्वविद्यालय में आपराधिक गतिविधियां तेज हो गयी. ... उस समय बेगूसराय के लोगों ने ही यहां अपराध की नींव डाली […]

By Prabhat Khabar Digital Desk | March 11, 2014 11:34 AM

मुजफ्फरपुर: बीआरए बिहार विश्वविद्यालय का पुराना आपराधिक इतिहास रहा है. 1972 में कांग्रेस सुखदेव सिंह के पुत्र वीरेंद्र सिंह ने पहली बार एक हॉस्टल पर बम विस्फोट कर अपराध की शुरुआत की थी. उसके बाद विश्वविद्यालय में आपराधिक गतिविधियां तेज हो गयी.

उस समय बेगूसराय के लोगों ने ही यहां अपराध की नींव डाली थी. इसी आपराधिक इतिहास की कड़ी में 1978 मे मोचू नरेश की हत्या कर दी गयी. जिसमें भासो सिंह व वीरेंद्र सिंह का नाम आया था. इसके बाद विश्वविद्यालय के छात्र रहे मिनी नरेश का आपराधिक इतिहास बढ़ा. उन्होंने 1983 में रामानंद सिंह की हत्या कर दी. 1989 में महंत रामलगन दास व राजकिशोर सिंह ने पीजी हॉस्टल में मिनी नरेश की हत्या कर दी. 1990 में मुंगेर के छात्र गब्बर सिंह की हत्या एलएस कॉलेज के चबूतरे पर दिनदहाड़े हत्या कर दी गयी. जिसके बाद वहां अशोक सम्राट का वर्चस्व कायम हुआ.

1995 में हाजीपुर के रजाैली में कथित पुलिस मुठभेड़ में अशोक सम्राट मारे गये. 1995 के बाद मानस चौधरी व बबलू देव के बीच वर्चस्व की लड़ाई छिड़ी. जिसमें कई लोगों की हत्याएं हुई. फिर उसके बाद इंद्रमोहन ने विश्वविद्यालय के अपराध का कमान थाम लिया. इस बीच भी कई हत्याएं हुई. 2001 में जब इंद्रमोहन मुखिया बना तो अपराध में कुछ कमी आयी, लेकिन उसका वर्चस्व कायम रहा, जिसके बाद एलएस कॉलेज में सीआरपीएफ कैंप स्थापित किया गया. इसके बाद करीब विश्वविद्यालय शांत हो गया था. पिछले साल फिर शमीम की हत्या के बाद थोड़ा मामला गरमाया. लेकिन कभी भी जातीय तनाव नहीं हुआ. कभी-कभी आपस में इक्की दुक्की घटनाएं घट जाती थी. लेकिन कभी भी जातीय रूप देने की कोशिश नहीं हुई. यहां की लड़ाई आपसी वर्चस्व व गैंगवार के बीच होती थी. आज स्थिति यहां तक पहुंच गयी है कि जातीय विवाद के कारण नक्सली संगठन भी यहां अपनी पैठ बनाने में लग गये हैं.

पूर्व छात्र अमिताभ कुमार ने बताया कि मंडल कमीशन के समय नाम मात्र मनमुटाव हुआ था. लेकिन जातीय विवाद नहीं हो पाया. अब कुछ छात्र अपने वर्चस्व कायम करने के लिए इसे जातीय रूप देना चाह रहे हैं, जो यहां का माहौल खराब करने की कोशिश है.