कंपकंपाती ठंड में नहीं मिल रहा काम, रोजी-रोटी पर संकट
शहर के जुबली बेल चौक बेकापुर मजदूरों की मंडी रही है. जहां गर्मी हो या सर्दी, धूप हो या बारिश यहां पर हर सुबह काम की तलाश में दिहाड़ी मजदूर और राज मिस्त्री का जमावड़ा लगता है.
लोग बोले : बच्चों की फीस व घर की चिंता से रात में नहीं आती नींद
मुंगेर. शहर के जुबली बेल चौक बेकापुर मजदूरों की मंडी रही है, जहां गर्मी हो या सर्दी, धूप हो या बारिश यहां पर हर सुबह काम की तलाश में दिहाड़ी मजदूर और राज मिस्त्री का जमावड़ा लगता है. लेकिन भीषण सर्दी के बीच रोजी-रोटी की तलाश में सुबह-सवेरे मंडी में आने वाले दिहाड़ी मजदूरों के लिए हर दिन संघर्ष में बदल गया है. ठंड के कारण उन्हें काम नहीं मिल पा रहा है. हालात यह है कि इस ठंड ने उनसे रोजी-रोटी दोनों छीन लिया है और घरों में चूल्हा जलाना तक मुश्किल हो गया है.उधारी व भुखमरी में कट रही जिंदगी
इस कड़ाके की ठंड से कोई घर से निकलना नहीं चाहता है, लेकिन अपने और अपने बच्चों के पेट की आग बुझाने की चिंता के साथ मजदूर हर दिन मजदूरों की मंडी में पहुंचते है. कोई साइकिल से तो कोई भाड़े की गाड़ी से तो कोई पैदल यहां काम की तलाश में आते हैं. कोई पांच तो कोई 10 किलोमीटर से चल कर काम की तलाश में आते हैं, जिसमें कुछ को काम मिलता है तो कुछ को काम नहीं मिल पाता है. शाम ढलते ही मायूस मजदूर अपने घरों की ओर लौटते हैं, जहां बच्चों और परिवार के सामने जवाब देना कठिन हो जाता है. मजदूरों का कहना है कि लगातार कई दिनों से काम न मिलने के कारण उधारी बढ़ती जा रही है. मजदूरों की मानें तो ठंड के कारण काम मिलना मुश्किल हो रहा है, क्योंकि सुबह विलंब से हो रही और शाम पहले आ जाती है. ऐसे में लोग जरूरत पड़ने पर ही घरों में या अन्य जगहों पर काम लगाते हैं, जिसके कारण अधिकांश मजदूरों को काम नहीं मिलता है.मजदूरों के लिए नहीं है प्रतिक्षालय, कमजोर शरीर वालों की बढ़ी परेशानी
वर्षों से यहां मजदूरों की मंडी सजती है, लेकिन यहां न तो मजदूरों के बैठने और धूप, बारिश, शीतलहर से बचने के लिए प्रतीक्षालय की व्यवस्था है और न ही मूलभूत सुविधा, जिसके कारण काम की तलाश में समय गुजारना इनके लिए काफी मुश्किल हो रहा है. दिनभर ठिठुरते हुए खड़े रहने से कई मजदूर बीमार पड़ने लगे हैं. बुजुर्ग मजदूरों और कमजोर शरीर वालों के लिए हालात और भी कठिन हैं. मजदूरों का दर्द है कि जब काम नहीं मिलता तो बैठकर इंतजार करना भी संभव नहीं होता.———–सर्दी से बेदम मजदूरों के दर्द की कहानी, उनकी जुबानी
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साइकिल चला कर रोज छह किलोमीटर दूर सदर प्रखंड के मोहली शंकरपुर से काम की तलाश में यहां आते हैं, ताकि काम मिले तो घर में चूल्हा जल सके, क्योंकि उसके कंधों पर मां-बाप, पत्नी ओर बेटा-बेटी के भरण-पोषण की जवाबदेही है, लेकिन इस ठंड में 5-5, 10-10 दिन काम नहीं मिल पाता है, जिसके कारण परिवार का भरण-पोषण मुश्किल हो रहा है.
शैलेश मिस्त्री, मोहली शंकरपुर
———————————–पांच परिवार के भरण-पोषण, बेटा-बेटी की पढ़ाई-लिखाई मुश्किल हो गयी है. ठंड के कारण नियमित काम नहीं मिल रहा है, जिसके कारण परेशानी काफी बढ़ गयी है, जबकि मकर संक्रांति पर्व भी नजदीक है. अगर काम नहीं मिला तो पर्व में पकवान तो दूर रूखी-सूखी रोटी पर भी आफत आ जायेगी.
सुशील मंडल, शेरपुर
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प्रतिदिन साइकिल से 10 किलोमीटर सफर तय कर डकरानाला से मुंगेर आते हैं, क्योंकि 14 साल की मुस्कान और 12 साल की मुन्नी एवं 16 साल के बेटे के पढ़ाई की फीस भरना है. परिवार को चलाना है, जबकि कमाने वाला मैं एक मात्र हूं. कड़ाके की ठंड और घना कोहरा को चीर कर यहां आते हैं, लेकिन काम नहीं मिलता. किसी से कर्ज लेकर तो दुकानदार से उधार लेकर घर चलाना पड़ रहा है.मुकेश मिस्त्री, डकरानाला
————————————भीषण ठंड के कारण महीने में 10-15 दिन मुश्किल से काम मिल पाता है, जिससे परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल हो रहा है. वह कमाने वाले एक मात्र हैं, जबकि घर में पत्नी और एक छोटा बेटा है. लगता है मकर संक्रांति जैसे पर्व पर भी काम नहीं मिला तो चूड़ा-दही, तिलकुट का इंतजाम करना भी मुश्किल हो जायेगा.
राहुल यादव, हसनगंज
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मजदूरी की तलाश में साइकिल से रोज सुबह जुबली बेल चौक आते हैं. किसी दिन काम मिलता तो अधिकांश दिन बिना काम के ही घर वापस लौटना पड़ रहा है. काम नहीं मिलने के कारण पांच परिवार का घर चलना मुश्किल हो गया है. मजबूरी में कर्ज लेकर घर चलाते हैं. परिवार चलाना मुश्किल हो रहा है.बुलबुल महतो, चंडीस्थानB
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