असरगंज. वृंदावन से पधारे कथावाचक आचार्य शिवम मिश्रा ने भगवान की माया व भक्त नारद के प्रसंग को सुनाया. वे शुक्रवार को राज बनेली स्मृति पुरानी दुर्गा मंदिर, जलालाबाद के प्रांगण में सूर्य मंदिर के तीसरे स्थापना दिवस पर आयोजित नौ दिवसीय शिव महापुराण कथा के तीसरे दिन श्रद्धालुओं को प्रवचन करते हुए कही. आचार्य शिवम महाराज ने कहा कि हिंदू धर्मग्रंथों में भक्त नारद को ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का प्रतीक माना गया है. वे त्रिकालदर्शी, ब्रह्मज्ञानी और भगवान विष्णु के परम भक्त हैं. किंतु एक प्रसंग ऐसा भी आता है जहां स्वयं नारद जी भगवान की माया से मोहित हो जाते हैं. नारद जी के मन में एक बार यह विचार उत्पन्न हुआ कि वे माया से सर्वथा अछूते हैं. उन्होंने भगवान विष्णु से उनकी माया के स्वरूप को देखने की इच्छा प्रकट की. भगवान ने उन्हें समझाया कि माया को समझना सरल नहीं है, फिर भी नारद जी के आग्रह पर वे मौन रहे. मार्ग में चलते हुए नारद जी को प्यास लगी और एक नगर में प्रवेश करते ही वे माया के प्रभाव में आ गये. वहां उन्होंने विवाह किया और गृहस्थ जीवन में बंध गये. इसके बाद वे संतानों सहित सुख-दुःख भोगे. समय बीतता गया और एक भयानक बाढ़ में उनका सब कुछ नष्ट हो गया. जब वे करुण क्रंदन कर रहे थे, तभी भगवान विष्णु प्रकट हुए और पूछा नारद जल कहां है, क्षण भर में नारद को बोध हो गया कि यह सब भगवान की माया थी. वे लज्जित और विनम्र होकर भगवान के चरणों में नतमस्तक हो गये. उन्होंने कहा कि यह प्रसंग सिखाता है कि अहंकार भी ज्ञानी को भ्रमित कर सकता है और ईश्वर की माया से कोई भी परे नहीं है. कथावाचक ने कहा कि माता सती का चरित्र भारतीय संस्कृति में नारी गरिमा, आत्मसम्मान और धर्मनिष्ठा का अनुपम उदाहरण है.
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