Motihari News: पूर्वी चंपारण जिला मुख्यालय मोतिहारी के कई प्रमुख चौक-चौराहे अब अपनी पारंपरिक पहचान छोड़कर "मजदूर चौक" के रूप में जाने जाने लगे हैं. हर सुबह रोज़गार की तलाश में सैकड़ों स्थानीय और प्रवासी मजदूर इन स्थानों पर जुटते हैं. ज्ञान बाबू चौक, कुंआरों देवी चौक, बलुआ चौक, चांदमारी चौक, छतौनी चौक और बापूधाम स्टेशन रोड पर सुबह के समय मजदूरों की भीड़ आम दृश्य बन चुकी है.
सुबह 6 बजे से लग जाती है मजदूरों की मंडी
बंजरिया, तुरकौलिया, सुगौली, पीपरा, कोटवा और हरसिद्धि सहित आसपास के ग्रामीण इलाकों से मजदूर सुबह-सुबह बस, ऑटो और साइकिल से शहर पहुंचते हैं. सुबह 6 बजे से 9 बजे तक इन चौराहों पर इतनी भीड़ रहती है कि पैर रखने तक की जगह नहीं बचती. यहां केवल दिहाड़ी मजदूर ही नहीं, बल्कि राजमिस्त्री, पेंटर, प्लंबर, कारपेंटर और बिजली मिस्त्री जैसे कुशल कारीगर भी काम की प्रतीक्षा में खड़े रहते हैं.
काम मिलने की उम्मीद, नहीं तो मायूसी
जैसे ही कोई मकान मालिक या ठेकेदार वाहन से पहुंचता है, मजदूर उसे घेर लेते हैं. काम और हुनर के आधार पर 400 से 600 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी तय होती है. हालांकि सभी को काम नहीं मिल पाता. सुबह 10 बजे तक जिन्हें काम नहीं मिलता, वे निराश होकर गांव लौट जाते हैं या पूरे दिन शहर में ही अगले अवसर की तलाश करते रहते हैं.
मजदूर चौक पर नहीं हैं बुनियादी सुविधाएं
इन स्थानों पर मजदूरों के बैठने के लिए शेड, पीने के पानी या शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है. गर्मी, बारिश और ठंड के मौसम में भी मजदूर खुले आसमान के नीचे खड़े रहने को मजबूर हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन को मजदूरों के लिए न्यूनतम सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए.
सरकारी योजनाओं पर उठे सवाल
मजदूरों का कहना है कि यदि गांव में मनरेगा और अन्य सरकारी योजनाओं के तहत पर्याप्त रोजगार मिलता तो उन्हें शहर के चौराहों पर खड़ा नहीं होना पड़ता. कई मजदूरों ने बताया कि वे श्रम विभाग की योजनाओं और पंजीकरण प्रक्रिया से भी अनजान हैं. ऐसे में श्रम संसाधन विभाग और मनरेगा के दावों पर सवाल उठ रहे हैं.
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