Madhubani : सामा चकेवा के मंचन के साथ फेस्टिवल का हुआ समापन

सारी-रात व रोहिणी रमण झा की मैथिली नाटक सामा-चकेवा का मंचन विवाह भवन बेनीपट्टी में किया गया.

लोक संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए किया गया फेस्टिवल का आयोजन मधुबनी . आदर्श महिला मंडल लडूगामा द्वारा आयोजित कला संस्कृति एवं युवा विभाग बिहार सरकार द्वारा प्रायोजित तीन दिवसीय फेस्टिवल के तीसरे और अंतिम दिन बादल सरकार लिखित नाटक सारी-रात व रोहिणी रमण झा की मैथिली नाटक सामा-चकेवा का मंचन विवाह भवन बेनीपट्टी में किया गया. सारी रात नाटक में वृद्ध व्यक्ति के किरदार में डॉ. सतेंद्र कुमार झा, पति के किरदार में शिवम झा व पत्नी के किरदार में पल्लवी ने बखूबी भूमिका निभाई. वस्तु विन्यास व रूप-सज्जा में डेजी शायना और मंच सज्जा में शिवेश शिवम ने अच्छा काम किया. उसके बाद सामा-चकेवा नाटक का मंचन किया गया. सामा के किरदार में मनीषा कुमारी थी. चारुक्त के किरदार में नीरज कुमार पाण्डेय, कृष्ण के किरदार में रौशन कुमार, जाम्बंती के किरदार में रानी, चुड़क के किरदार में अर्जुन, नारद के किरदार में आर्य कुमार, पहले सूत्रधार के रूप में विजय कुमार, दुसरे सूत्रधार के रूप में आयुष मोनिष, सैनिक के किरदार में बादल कुमार तथा साम्ब के किरदार में मिथिलेश कुमार थे ने अच्छा काम किया. पार्श्व संगीत में राहुल मनीष, आनंद ठाकुर थे. रूप-सज्जा में प्रवीण कुमार व राहुल कुमार थे. सामा-चकेवा नाटक सामा की दुःख भरी कहानी से है. सामा कृष्ण की पुत्री थी. जिसका वर्णन पुरानों में भी है. कहानी यह है कि एक दुष्ट चरित्र वाले व्यक्ति ने एक योजना रची. उसने सामा पर गलत आरोप लगाया कि उसका अवैध संबंध एक तपस्वी से है. उसने कृष्ण से यह बात कह दिया. कृष्ण को अपनी पुत्री सामा के प्रति बहुत ही गुस्सा आया. क्रोध में आकर उसने सामा को पक्षी बन जाने का श्राप दे दिया. सामा अब मनुष्य से पक्षी बन गयी. जब सामा के भाई चकेवा को इस प्रकरण की पूरी जानकारी हुई तो उसे अपनी बहन सामा के प्रति सहानुभूति हुई. अपनी बहन को पक्षी से मनुष्य रूप में लाने के लिए चकेवा ने तपस्या करना शुरू कर दिया. तपस्या सफल हुआ. सामा पक्षी रूप से पुनः मनुष्य के रूप में आ गयी. अपने भाई की स्नेह और त्याग देख कर सामा द्रवित हो गयी. वह अपने भाई की कलाई में एक मजबूत धागा राखी के रूप में बांध दी. उसी के याद में आज बहनें अपनी भाइयों की कलाई में प्रति वर्ष बांधती आ रही है. नाटक का रूपांतरण परिकल्पना एवं निर्देशन स्तुति कुमार ने किया. कैमियो पर मुकुल मुकेश थे. मंच संचालन शारदा झा ने किया.

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