Madhushravani Festival Mithila: सुहाग की लंबी उम्र और नवविवाहित जीवन में मिठास घोलने वाला मिथिलांचल का सुप्रसिद्ध लोकपर्व 'मधुश्रावणी' 15 अगस्त को संपन्न होने जा रहा है. 13 दिनों तक चलने वाले इस विशेष अनुष्ठान को लेकर नवविवाहिताओं में खासा उत्साह देखने को मिला. सावन महीने के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि से शुरू होकर शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि तक चलने वाला यह पर्व नवविवाहिताओं के धैर्य, निष्ठा और समर्पण का प्रतीक है.
मायके में व्रत और ससुराल से आती है पूजा सामग्री
यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है, बल्कि दो परिवारों के बीच प्रेम, सम्मान और सामाजिक रिश्तों को मजबूत करने वाली अनूठी परंपरा है:
- मायके में पूजा: विवाह के बाद पहली बार नवविवाहित महिलाएं अपने मायके में रहकर यह व्रत करती हैं.
- ससुराल से उपहार: पूजा में उपयोग होने वाले वस्त्र, श्रृंगार प्रसाधन, भोजन और सामग्री ससुराल पक्ष से भेजी जाती है.
13 दिनों का कठिन नियम और टेमी दागने की रस्म
मधुश्रावणी व्रत के दौरान महिलाएं 13 दिनों तक बिना नमक का भोजन ग्रहण कर माता गौरी और भगवान शिव की आराधना करती हैं.
- पौराणिक कथाएं: प्रतिदिन वयोवृद्ध महिलाओं और महिला पुरोहितों द्वारा विषहरा, शिव-पार्वती और सती बिहुला की कथाएं सुनाई जाती हैं.
- विशेष पूजन सामग्री: गोबर और मिट्टी से बने विषहरा, गौरी-शंकर, नाग-नागिन की प्रतिमाएं, बासी फूल और चनाई का पूजा में विशेष महत्व होता है.
- समापन रस्म: 15 अगस्त को पारंपरिक 'टेमी दागने' की अनूठी रस्म के साथ इस महाव्रत का विधिवत समापन होगा.
सांस्कृतिक जुड़ाव: यह व्रत केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक पहचान से युवाओं को जोड़े रखने और पति की दीर्घायु व सुख-समृद्धि की कामना का सबसे बड़ा पर्व है.
ये भी पढ़ें: मधुबनी: दुनिया की सबसे लंबी मिथिला पेंटिंग! 200 कलाकार उकेर रहे राम-सीता की 51 प्रसंगों वाली गाथा
