बलिराजगढ़ उत्खनन की डीएम ने की समीक्षा, 3 हजार साल पुरानी विकसित नगरी के मिले संकेत

मधुबनी के बलिराजगढ़ में एएसआई के उत्खनन कार्य की डीएम आनंद शर्मा ने समीक्षा की. खुदाई में रिंग वेल, किलेबंदी, जल निकासी प्रणाली और अन्य पुरातात्विक अवशेष मिले हैं, जिससे करीब 3 हजार साल पुरानी विकसित नगरी के संकेत मिले हैं.

मधुबनी से नागेंद्र नाथ झा की रिपोर्ट

Madhubani: मधुबनी के ऐतिहासिक बलिराजगढ़ में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा चल रहे उत्खनन कार्य की शनिवार को जिलाधिकारी आनंद शर्मा ने वर्चुअल माध्यम से समीक्षा की. बैठक में उत्खनन की प्रगति, मिले पुरातात्विक अवशेषों और आगामी कार्ययोजना पर चर्चा करते हुए डीएम ने वैज्ञानिक पद्धति और गुणवत्ता के साथ निर्धारित समय-सीमा में खुदाई आगे बढ़ाने के निर्देश दिए.

बलिराजगढ़ को बताया मिथिला की ऐतिहासिक धरोहर

जिलाधिकारी ने कहा कि बलिराजगढ़ केवल बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश की महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहर है. यहां हो रही वैज्ञानिक खुदाई से मिथिला की प्राचीन सभ्यता, सांस्कृतिक समृद्धि और ऐतिहासिक विरासत से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ रहे हैं.

गौरतलब है कि बाबूबरही प्रखंड के भूपट्टी और पचरुखी पंचायत की सीमा में स्थित बलिराजगढ़ को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने संरक्षित स्मारक घोषित किया है. वर्तमान में यहां चरणबद्ध तरीके से वैज्ञानिक उत्खनन किया जा रहा है.

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छह ट्रेंच में चल रही खुदाई, कई महत्वपूर्ण पुरावशेष मिले

फिलहाल छह ट्रेंच में उत्खनन कार्य जारी है. इनमें तीन ट्रेंच किलेबंदी क्षेत्र और तीन किले की दक्षिण दिशा में करीब 200 मीटर दूर स्थित हैं.

खुदाई के दौरान विशाल ईंट निर्मित किलेबंदी, प्राचीन फर्श, पत्थर के गोले, मिट्टी के बर्तन और नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर (NBPW) प्राप्त हुए हैं, जो विकसित शहरी संस्कृति के प्रमाण माने जा रहे हैं.

दक्षिणी क्षेत्र के एक ट्रेंच में 5.40 मीटर गहराई पर 13 परतों वाला रिंग वेल मिला है. विशेषज्ञों का मानना है कि इसका उपयोग जल संग्रहण, अन्न भंडारण या घरेलू कार्यों में किया जाता रहा होगा. यहां से टेराकोटा मानव एवं पशु प्रतिमाएं, खिलौना गाड़ी, मनके और अन्य प्राचीन वस्तुएं भी मिली हैं.

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जल निकासी प्रणाली और 3 हजार साल पुरानी बसावट के मिले प्रमाण

उत्खनन के दौरान एक अन्य ट्रेंच में प्राचीन जल निकासी प्रणाली (ड्रेनेज सिस्टम), सोख्ता गड्ढा, मुहरें, सीलिंग, टेराकोटा प्रतिमाएं और विभिन्न प्रकार के मृदभांड भी प्राप्त हुए हैं. इसके अलावा सात परतों वाली ईंट निर्मित संरचना भी मिली है.

पुरातत्वविदों के अनुसार बलिराजगढ़ से प्राप्त सांस्कृतिक साक्ष्य लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व के हैं. विशाल किलेबंदी, रिंग वेल, उन्नत जल निकासी व्यवस्था और अन्य पुरावशेष इस बात के संकेत देते हैं कि यह क्षेत्र करीब तीन हजार वर्ष पहले एक सुव्यवस्थित और समृद्ध नगरीय केंद्र था, जो लंबे समय तक आबाद रहा.

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By Sarfaraz Ahmad

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