Madhepura News: मिथिलांचल का नाम आते ही मन में मखाना, जल-स्रोतों और पोखरों में तैरती मछलियों की सुंदर तस्वीर तैरने लगती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब इस पारंपरिक खेती और मत्स्य पालन को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) जैसी आधुनिक तकनीकों से जोड़ दिया जाए, तो क्या चमत्कार हो सकता है. बिहार के मधेपुरा जिला अंतर्गत पुरैनी स्थित यूवीके कॉलेज कड़ामा में मंगलवार को कुछ ऐसा ही ऐतिहासिक और क्रांतिकारी नजारा देखने को मिला. अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) 'वाणी' योजना के सौजन्य से दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ हुआ, जहां वैज्ञानिकों और दिग्गजों ने मैथिली भाषा में तकनीकी विमर्श कर यह साबित कर दिया कि अपनी मातृभाषा में भी हाई-टेक खेती का ज्ञान गांव-गांव तक पहुंचाया जा सकता है.
मैथिली में पहली बार हाई-टेक मंथन, दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ आगाज़
'नदी परंपरा से जल तकनीक तक, सतत मत्स्य पालन एवं मखाना खेती के लिए इंटरनेट ऑफ थिंग्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग' विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी की शुरुआत मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा के साथ हुई. कार्यक्रम का उद्घाटन भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर डॉक्टर बीएस झा, कोसी प्रक्षेत्र के पुलिस उपमहानिरीक्षक (डीआईजी) डॉ आशीष कुमार, श्रीकृष्ण विश्वविद्यालय के कुलाधिपति प्रो डॉक्टर अवध किशोर राय, कुलपति डॉ अशोक कुमार, प्रो डॉ बीएन बिवेका, पूर्व कुलसचिव डॉ कपिलदेव यादव, मधेपुरा कॉलेज की प्राचार्या डॉ पूनम कुमारी एवं यूवीके कॉलेज के प्राचार्य अमरेंद्र कुमार झा ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया. इससे पहले कॉलेज परिसर पहुंचने पर डीआईजी डॉ आशीष कुमार को भव्य सलामी दी गई. सभी अतिथियों का स्वागत पाग, शॉल और स्मृति चिह्न देकर किया गया.
स्मार्ट सेंसर और AI से बदलेगी मखाना व मत्स्य पालन की तस्वीर
संगोष्ठी के दौरान वैज्ञानिकों और विषय विशेषज्ञों ने इस बात पर गहराई से विचार किया कि कैसे साधारण किसान भी तकनीक का इस्तेमाल कर अपनी आमदनी कई गुना बढ़ा सकते हैं. विशेषज्ञों ने बताया कि तालाबों में इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) आधारित स्मार्ट सेंसर लगाकर पानी का तापमान, पीएच स्तर और ऑक्सीजन की मात्रा को मोबाइल पर ही ट्रैक किया जा सकता है. वहीं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए मछलियों और मखाना के पौधों में लगने वाली बीमारियों का समय रहते पता लगाया जा सकता है. इस डिजिटल निगरानी से मखाना व मछली पालन में उत्पादन की गुणवत्ता बढ़ेगी, जल प्रबंधन बेहतर होगा और प्रसंस्करन, भंडारण तथा बाजार तक पहुंच बेहद आसान हो जाएगी. संगोष्ठी के समन्वयक डॉ ललन कुमार झा ने आयोजन के मुख्य उद्देश्यों पर प्रकाश डाला.
मखाना के वैज्ञानिक पहलू और युवाओं के लिए डीआईजी का ख़ास संदेश
तकनीकी सत्रों के दौरान बीएनएमयू के वनस्पति विज्ञान विभाग के जाने-माने मखाना शोधकर्ता डॉक्टर पंचानन मिश्रा ने मखाना उत्पादन के वैज्ञानिक पहलुओं और भविष्य की वैश्विक संभावनाओं की विस्तृत जानकारी साझा की. उन्होंने बताया कि बिहार का मखाना अब केवल स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि स्मार्ट प्रोसेसिंग के जरिए इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान दिलाई जा सकती है. कार्यक्रम में मौजूद कोसी रेंज के डीआईजी डॉ आशीष कुमार ने केवल तकनीक ही नहीं, बल्कि सामाजिक सरोकारों पर भी बात की. उन्होंने युवाओं को नशे के भयानक दुष्परिणामों के प्रति सतर्क करते हुए नशामुक्त जीवन जीने, अनुशासन बनाए रखने और जिम्मेदार नागरिक बनने की पुरजोर अपील की.
Madhepura News: नीली अर्थव्यवस्था और ग्रामीण किसानों की माली हालत पर इसका असर
इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का सबसे बड़ा संदेश यह है कि जब वैज्ञानिक जानकारी किसान की अपनी बोली-भाषा मैथिली में उपलब्ध होगी, तो तकनीक को अपनाने में हिचकिचाहट खत्म हो जाएगी. स्मार्ट कृषि और नीली अर्थव्यवस्था (ब्लू इकोनॉमी) के इस दौर में बिहार के मखाना और मत्स्यपालक किसानों को अब पारंपरिक नुकसान से मुक्ति मिलेगी. आयोजन में परीक्षा नियंत्रक डॉ चंद्रशेखर मिश्रा, निदेशक डॉ सिप्पु कुमार, सह समन्वयक डॉ एमडी मुदस्सिर सिद्दीकी, संजीत कुमार झा और हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ शेखर झा सहित राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के स्वयंसेवकों, शिक्षकों और कर्मचारियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही. यह संगोष्ठी आने वाले समय में कोसी-मिथिलांचल के कृषि परिदृश्य को पूरी तरह बदलने का काम करेगी.