लखीसराय. किऊल के वृंदावन गांव में एक नाबालिग द्वारा दूसरे किशोर की चाकू मारकर की गई हत्या ने समाज को झकझोर कर रख दिया है. इस जघन्य वारदात के पीछे के मनोवैज्ञानिक पहलुओं को लेकर अब चर्चाएं तेज हो गई हैं. जानकारों का मानना है कि एक किशोर के जेहन में हत्या जैसा खौफनाक विचार आना केवल एक क्षणिक आवेश नहीं, बल्कि गहरे मानसिक और सामाजिक परिवेश का परिणाम है.
परिवेश व पारिवारिक चर्चा का पड़ता है गहरा असर
शहर के केएसएस कॉलेज की मनोविज्ञान विभाग की व्याख्याता डॉ. स्मृति कुमारी के अनुसार, किसी भी नाबालिग की सोच उसके आसपास के परिवेश पर निर्भर करती है. उन्होंने बताया कि यदि परिवार में बच्चों के सामने हिंसक बातें या पुरानी रंजिशों का बार-बार जिक्र होता है, तो वह उनके कोमल मस्तिष्क में ”प्रतिशोध” के बीज बो देता है. रहन-सहन और परिवार का माहौल बच्चे के व्यक्तित्व को आकार देने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
”मार दो, जो होगा देखा जाएगा” वाली संगति घातक
डॉ. स्मृति का कहना है कि किशोरों के बीच का मित्र-मंडली और वहां होने वाली चर्चाएं भी अपराध का बड़ा कारण बनती हैं. अक्सर साथियों के बीच ”मार दो, जो होगा देखा जाएगा” जैसी गैर-जिम्मेदाराना बातें होती हैं. ऐसे में नाबालिग बिना परिणाम सोचे खौफनाक वारदातों को अंजाम दे बैठते हैं. उन्हें यह अहसास ही नहीं होता कि एक पल का आवेश उनके और दूसरे परिवार का भविष्य बर्बाद कर सकता है.
टेक्नोलॉजी और उत्तेजक गेम्स का नकारात्मक प्रभाव
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से ”जेन-जी” यानी तकनीकी रूप से उन्नत पीढ़ी के अपराधी बनने के पीछे मोबाइल और इंटरनेट भी एक बड़ा कारण है. डॉ स्मृति के अनुसार एंड्रॉइड मोबाइल पर उपलब्ध उत्तेजक और हिंसक गेम्स बच्चों के व्यवहार में चिड़चिड़ापन और आक्रामकता ला रहे हैं. सोशल मीडिया पर परोसी जा रही हिंसक सामग्री उनके दिमाग को प्रभावित कर रही है.
बचाव का रास्ता: काउंसलिंग और ब्रेन वॉश
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी नाबालिग के व्यवहार में अचानक बदलाव दिखे या उसके दिमाग में आपराधिक विचार आ रहे हों, तो उसे तुरंत काउंसलिंग की जरूरत है. अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों के साथ संवाद बढ़ाएं और उनके दिमाग से नकारात्मकता को बाहर निकालने के लिए बार-बार समझाएं. सही समय पर हस्तक्षेप से ऐसी घटनाओं को शहर और गांवों में होने से रोका जा सकता है.
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