किशनगंज ठाकुरगंज प्रखंड में रेस्पेक्टफुल मैटरनिटी केयर (सम्मानजनक मातृत्व देखभाल) की पहल ने यह साबित कर दिया है कि सम्मानजनक व्यवहार ही वह कड़ी है, जो वर्षों के डर और भ्रांतियों को भरोसे में बदल सकती है. जहां पहले सरकारी अस्पतालों को लेकर उपेक्षा, डर और कठोर व्यवहार की धारणाएं थीं, वहीं अब सम्मानजनक अनुभव के कारण परिवार स्वयं संस्थागत प्रसव को प्राथमिकता देने लगे हैं. डर से विश्वास तक का सफर बेसरबाटो पंचायत की नजमा खातून पहले उन महिलाओं में थीं, जो अस्पताल का नाम सुनते ही घबरा जाती थीं. नजमा बताती हैं कि परिवार की बुजुर्ग महिलाएं अक्सर कहती थीं कि घर पर ही प्रसव सुरक्षित है और अस्पतालों में महिलाओं के साथ ठीक से व्यवहार नहीं किया जाता लेकिन आशा कार्यकर्ता द्वारा बार-बार समझाने के बाद नजमा ने ठाकुरगंज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रसव का निर्णय लिया. रेस्पेक्टफुल केयर में सुधार पर जोर रेस्पेक्टफुल मैटरनिटी केयर को ज़मीन पर उतारने के लिए ठाकुरगंज स्वास्थ्य केंद्रों में कई व्यवहारिक और संरचनात्मक सुधार किए गए हैं. लेबर रूम में महिलाओं की निजता सुनिश्चित करने के लिए पर्दों और स्क्रीन की व्यवस्था, अनावश्यक भीड़ पर नियंत्रण और महिला की सहमति के बिना कोई भी प्रक्रिया न करने पर विशेष जोर दिया गया है. प्रसव के दौरान महिला से सम्मानजनक भाषा में संवाद, उसकी तकलीफ को समझना, दर्द के समय धैर्यपूर्वक सहयोग देना और परिजन को निर्धारित समय पर जानकारी देना, इन सभी बिंदुओं को स्टाफ प्रशिक्षण का हिस्सा बनाया गया है. व्यवहार परिवर्तन हुआ कारगर स्वास्थ्यकर्मियों के व्यवहार में आए सकारात्मक बदलाव को महिलाएं अब खुलकर महसूस कर रही हैं. पहले जहां सख्ती, जल्दबाज़ी और दूरी की शिकायतें होती थीं, वहीं अब संवाद, धैर्य और सहयोग का माहौल दिखाई देता है. महिला चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. शबनम यास्मीन बताती हैं, लेबर रूम में स्टाफ को संवेदनशील संवाद और सम्मानजनक देखभाल के लिए लगातार प्रेरित किया जाता है. जब महिला निश्चिंत होती है, तो प्रसव की प्रक्रिया भी अधिक सहज और सुरक्षित हो जाती है. सम्मान ही सेवा की आत्मा सिविल सर्जन डॉ. राज कुमार चौधरी ने कहा कि रेस्पेक्टफुल मैटरनिटी केयर केवल एक नीति या निर्देश नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की नैतिक जिम्मेदारी है. महिला को सुरक्षित प्रसव के साथ-साथ गरिमा और सम्मान मिलना चाहिए. ठाकुरगंज जैसे क्षेत्रों में महिलाओं के सकारात्मक अनुभव ही सबसे बड़ी जागरूकता बनते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि आशा, एएनएम और सीएचओ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वही समुदाय और स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच सेतु बनकर भरोसे की नींव रखते हैं. बदलती सोच, मजबूत होता भरोसा नजमा खातून की कहानी यह दर्शाती है कि एक सम्मानजनक अनुभव कैसे पीढ़ियों पुरानी धारणाओं को तोड़ सकता है. रेस्पेक्टफुल मैटरनिटी केयर ने न केवल एक महिला को सुरक्षित प्रसव का अनुभव दिया, बल्कि पूरे परिवार और समुदाय में संस्थागत प्रसव को लेकर विश्वास पैदा किया है. आज ठाकुरगंज में यह पहल केवल अस्पताल की दीवारों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि गांव-समाज की सोच में बदलाव की एक सशक्त शुरुआत बन चुकी है.
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