100 साल पुराना इतिहास: जब ठाकुरगंज स्टेशन से होकर गुजरता था दार्जिलिंग जाने का रास्ता

Thakurganj Railway Station History: बिहार के सीमांचल का एक छोटा सा स्टेशन कभी भारतीय रेल नेटवर्क का ऐसा ऐतिहासिक जंक्शन था, जहां मैदान खत्म होते थे और पहाड़ों की यात्रा शुरू होती थी. सोशल मीडिया पर सामने आई एक दुर्लभ पुरानी तस्वीर ने ठाकुरगंज रेलवे स्टेशन के उस गौरवशाली और भूले-बिसरे इतिहास को फिर से जिंदा कर दिया है, जिसे आज के लोग लगभग भूल चुके हैं.

ठाकुरगंज (किशनगंज) से बच्छराज नखत की रिपोर्ट

Thakurganj Railway Station History: भारतीय रेल का इतिहास बेहद विशाल और दिलचस्प है. इस सफर में देश के कई ऐसे छोटे रेलवे स्टेशन हैं, जिनका अतीत बहुत गौरवशाली रहा है. समय के साथ भले ही आज उनकी पहचान आम स्टेशनों जैसी हो गई हो, लेकिन इतिहास के पन्नों में उनका नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज है. बिहार के किशनगंज जिले में स्थित ठाकुरगंज रेलवे स्टेशन भी एक ऐसा ही ऐतिहासिक नाम है. आज यह देखने में एक आम और सामान्य रेलवे स्टेशन जैसा लगता है. लेकिन ब्रिटिश काल और आजादी के शुरुआती दिनों में इसकी भूमिका बहुत बड़ी थी.

दुर्लभ तस्वीर ने खोला इतिहास का पन्ना

हाल ही में सोशल मीडिया पर ठाकुरगंज स्टेशन की एक बेहद दुर्लभ और पुरानी तस्वीर सामने आई है. इस ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर ने इतिहास का एक ऐसा पन्ना खोल दिया है, जिसे आज की पीढ़ी पूरी तरह भूल चुकी थी. इस तस्वीर के सामने आते ही इलाके के बुजुर्गों और इतिहासकारों में एक नया कौतूहल जाग गया है.

इस पुरानी तस्वीर में ठाकुरगंज स्टेशन पर लगे एक पुराने लोहे के बोर्ड को देखा जा सकता है. उस बोर्ड पर बड़े-बड़े अक्षरों में “THAKURGANJ JN.” यानी ठाकुरगंज जंक्शन लिखा हुआ है. यह देखना आज के लोगों के लिए बेहद हैरान करने वाला है कि कभी उनके कस्बे का यह स्टेशन एक जंक्शन हुआ करता था.

बोर्ड पर लिखा था— ‘ट्रेन बदलें’

इतना ही नहीं, उस ऐतिहासिक बोर्ड पर नीचे यात्रियों की जानकारी के लिए साफ-साफ लिखा था— “CHANGE FOR D.H.RLY. / O.T.RLY.” इसका सीधा और सरल मतलब था कि दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे और अवध-तिरहुत रेलवे के लिए यात्री यहाँ से ट्रेन बदल सकते हैं. यह इस बात का सबूत है कि यह स्टेशन दो बड़े रेल नेटवर्क को आपस में जोड़ता था.

दार्जिलिंग जाने वालों का मुख्य पड़ाव

ब्रिटिश शासन काल के दौरान दार्जिलिंग अंग्रेजों का एक प्रमुख हिल स्टेशन और पसंदीदा पर्यटन केंद्र था. इसके साथ ही वह पूरा इलाका चाय उद्योग का भी दुनिया भर में सबसे बड़ा गढ़ था. उस दौर में उत्तर भारत और बिहार के अलग-अलग हिस्सों से दार्जिलिंग जाने वाले यात्रियों के लिए ठाकुरगंज एक मुख्य पड़ाव था.

यात्रियों को दार्जिलिंग की पहाड़ियों पर जाने के लिए ठाकुरगंज स्टेशन पर आकर ही अपनी ट्रेनें बदलनी पड़ती थीं. इस तरह देखा जाए तो ठाकुरगंज केवल एक रेलवे स्टेशन नहीं था. यह मैदानी इलाकों और पहाड़ों की खूबसूरत वादियों के बीच एक बहुत मजबूत पुल का काम करता था.

मैदानों और पहाड़ों के बीच का पुल

एक तरफ उत्तर बिहार और गंगा के विशाल मैदान थे, तो दूसरी तरफ दार्जिलिंग और हिमालय की ऊंची चोटियां थीं. इन दोनों अलग-अलग भौगोलिक दुनिया को जोड़ने में ठाकुरगंज स्टेशन ने सालों तक एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी.

इतिहासकार बताते हैं कि उस दौर में जब स्टेशन पर कोयले और भाप से चलने वाले भारी-भरकम इंजन पहुंचते थे, तब पूरा नजारा बदल जाता था. भाप के इंजनों की गूंज और उनकी तेज सीटियों से पूरा प्लेटफॉर्म हर वक्त जीवंत बना रहता था. यात्रियों की भारी भीड़ से स्टेशन हमेशा गुलजार रहता था.

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Thakurganj Railway Station History: धड़कती थी स्थानीय अर्थव्यवस्था

प्लेटफॉर्म पर कुलियों की भागदौड़, चायवालों की तेज आवाजें और मुसाफिरों की चहल-पहल से एक अलग ही रौनक दिखाई देती थी. इस बेहतरीन रेल संपर्क के कारण ठाकुरगंज के स्थानीय बाजारों को भी एक नई रफ्तार मिली थी.

देशभर से आने-जाने वाले यात्रियों के कारण यहाँ के स्थानीय होटलों, सरायों, कपड़ों की दुकानों और छोटे-मोटे कारोबारियों को बहुत बड़ा आर्थिक लाभ मिलता था. उस सुनहरे दौर में यह रेलवे स्टेशन ठाकुरगंज की स्थानीय अर्थव्यवस्था की असली धड़कन माना जाता था.

वक्त बदला और खो गया ‘जंक्शन’ का नाम

लेकिन समय के साथ भारतीय रेल के नेटवर्क का तेजी से विस्तार हुआ. नए-नए रेल मार्ग बनाए गए और रेलवे की प्राथमिकताएं भी बदल गईं. देश में परिवहन के अन्य आधुनिक साधनों का भी विकास हुआ. इसके बाद ठाकुरगंज का यह पुराना और ऐतिहासिक महत्व धीरे-धीरे कम होने लगा.

रेलवे लाइनों के नए पुनर्गठन के कारण बड़ी ट्रेनें दूसरे रास्तों से चलाई जाने लगीं. इसका सीधा नतीजा यह हुआ कि ठाकुरगंज स्टेशन के नाम के साथ जुड़ा ‘जंक्शन’ शब्द हमेशा-हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में खो गया. स्टेशन से पुराने बोर्ड हटा दिए गए और नए बोर्ड टांग दिए गए.

रेल विरासत को सहेजने की जरूरत

आज स्थिति यह है कि क्षेत्र के अधिकांश युवाओं और आम लोगों को यह मालूम तक नहीं है कि कभी उनका ठाकुरगंज राष्ट्रीय स्तर के रेल संपर्क का एक बहुत बड़ा केंद्र था. यही वजह है कि सामने आई यह पुरानी तस्वीर आज हमारे इतिहास के एक बेहद महत्वपूर्ण अध्याय को दोबारा जीवित कर रही है.

स्थानीय बुद्धिजीवियों और इतिहासकारों का मानना है कि ठाकुरगंज जैसी ऐतिहासिक रेल विरासत को सहेजकर रखना बहुत जरूरी है. उन्होंने रेल मंडल के वरिष्ठ अधिकारियों से मांग की है कि ठाकुरगंज स्टेशन पर इस पुराने बोर्ड का एक मॉडल और पुरानी तस्वीरों की एक गैलरी बनाई जाए, ताकि आने वाली पीढ़ी अपने गौरवशाली इतिहास को जान सके.

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By Divyanshu Prashant

दिव्यांशु प्रशांत वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल में बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। उन्होंने महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में परास्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। मीडिया क्षेत्र में लगभग एक वर्ष के अनुभव के दौरान वे दैनिक जागरण में न्यूज़ राइटर और रिपोर्टर के रूप में कार्य कर चुके हैं। करियर के शुरुआती दौर में लोकसभा और विधानसभा चुनावों से जुड़े पॉलिटिकल कंटेंट राइटिंग का विशेष अनुभव प्राप्त किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने टी. एन. बी. कॉलेज से हिंदी साहित्य में स्नातक किया है, जिसके कारण साहित्य, पठन-पाठन, लेखन और कविता-सृजन में उनकी विशेष रुचि है। सटीक, निष्पक्ष और प्रभावशाली लेखन के माध्यम से पाठकों तक विश्वसनीय जानकारी पहुँचाना उनकी पेशेवर पहचान है।

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