किशनगंज : सुबह की पहली किरण के साथ ही शहर और गांव की गलियों में एक परिचित दृश्य दिखाई देता है. नन्हे-नन्हे बच्चे कंधों पर भारी स्कूल बैग लटकाए विद्यालय की ओर बढ़ते नजर आते हैं. उनके चेहरों पर पढ़ाई की खुशी तो होती है, लेकिन कंधों पर लदा किताबों और कॉपियों का बोझ उस मुस्कान को कहीं न कहीं दबा देता है. शिक्षा का उद्देश्य बच्चों का भविष्य संवारना है, लेकिन बढ़ता स्कूल बैग अब उनके स्वास्थ्य और बचपन दोनों के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है.
तस्वीर में दिखाई दे रही छात्रा केवल एक बच्ची नहीं, बल्कि उन हजारों विद्यार्थियों का प्रतीक है, जो प्रतिदिन अपनी उम्र और शारीरिक क्षमता से अधिक वजन वाला बस्ता लेकर स्कूल पहुंचते हैं. किताबें, कॉपियां, गृहकार्य की फाइलें, प्रोजेक्ट सामग्री, टिफिन बॉक्स, पानी की बोतल और अन्य शैक्षणिक सामग्री मिलकर बस्ते का वजन इतना बढ़ा देती हैं कि छोटे बच्चों के कंधे झुकने लगते हैं. कई बच्चों को पैदल चलने, सीढ़ियां चढ़ने और लंबी दूरी तय करने में भी कठिनाई का सामना करना पड़ता है.
अभिभावकों का कहना है कि अधिकांश विद्यालयों में बच्चों को लगभग सभी विषयों की किताबें और कॉपियां प्रतिदिन लानी पड़ती हैं. इसके अलावा गृहकार्य की अलग कॉपियां, ड्राइंग सामग्री और अन्य आवश्यक सामग्री भी साथ रखनी होती है. ऐसे में पहली से पांचवीं कक्षा तक के बच्चों को भी कई किलोग्राम वजन रोजाना ढोना पड़ता है. उनका कहना है कि बच्चे पढ़ाई से कम और भारी बस्ते से अधिक परेशान दिखाई देते हैं.
स्थानीय चिकित्सक डॉ. ए. के. झा ने बताया कि छोटे बच्चों की हड्डियां और मांसपेशियां पूरी तरह विकसित नहीं होती हैं. ऐसे में लंबे समय तक क्षमता से अधिक वजन वाला स्कूल बैग उठाने से गर्दन, कंधे और रीढ़ की हड्डी पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है. इससे पीठ दर्द, गर्दन में खिंचाव, कंधों में दर्द, शरीर के संतुलन में बदलाव और भविष्य में रीढ़ संबंधी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं. उन्होंने कहा कि बच्चों के बस्ते का वजन उनकी शारीरिक क्षमता के अनुरूप होना चाहिए तथा विद्यालयों को अनावश्यक किताबें प्रतिदिन मंगाने से बचना चाहिए.
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य बच्चों के बौद्धिक विकास को बढ़ावा देना है, न कि उनके कंधों पर अतिरिक्त बोझ डालना. विषयवार समय-सारिणी का प्रभावी पालन, विद्यालय में लॉकर या पुस्तक रखने की व्यवस्था, डिजिटल अध्ययन सामग्री का उपयोग तथा अनावश्यक पुस्तकों की संख्या कम करना इस समस्या के समाधान में सहायक हो सकता है.
स्कूल बैग के वजन को लेकर समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी किए जाते रहे हैं, जिनमें कक्षा और आयु के अनुसार बस्ते का वजन सीमित रखने पर जोर दिया गया है. इसके बावजूद जमीनी स्तर पर इन मानकों का पूरी तरह पालन नहीं हो पा रहा है. यही कारण है कि आज भी हजारों बच्चे जरूरत से अधिक वजन अपने कंधों पर उठाने को मजबूर हैं.
अभिभावकों ने शिक्षा विभाग और विद्यालय प्रबंधन से स्कूल बैग के वजन संबंधी निर्धारित मानकों का सख्ती से पालन सुनिश्चित कराने की मांग की है. उनका कहना है कि शिक्षा बच्चों के सर्वांगीण विकास का माध्यम है, इसलिए उनके बचपन को अनावश्यक बोझ से मुक्त रखना भी उतना ही जरूरी है.
