Naxalbari Movement History: नक्सलबाड़ी से लौटकर बच्छराज नखत की रिपोर्ट: उत्तर बंगाल की शांत वादियों में बसा नक्सलबाड़ी आज जितना हरा-भरा और सामान्य दिखाई देता है, कभी यह उतना ही उग्र और संघर्षों से लहूलुहान हुआ करता था. 24 मई 1967 को नक्सलबाड़ी की धरती पर अधिकारों की लड़ाई में जो चिंगारी भड़की थी, उसने देश को ‘नक्सलवाद’ जैसा शब्द दिया. आज दशकों बाद इस ऐतिहासिक जमीन पर बारूद की जगह चाय बागानों की खुशबू महक रही है.
जमींदारों के अत्याचार और आर्थिक असमानता से उपजा था आंदोलन
सीपीआई (एमएल) के महासचिव और स्थानीय निवासी दीपू हालदार बताते हैं कि उस दौर में छोटे किसानों और आदिवासियों का जीवन बेहद दयनीय था. जमींदारों का जुल्म, भूख, कुपोषण और शोषण ने लोगों को भीतर तक तोड़ दिया था. इसी पीड़ा के चलते चारू मजूमदार, कानू सान्याल और कन्हाई चटर्जी जैसे नेताओं ने व्यवस्था के खिलाफ हथियारबंद संघर्ष का रास्ता चुना. यह आंदोलन चीन के कम्युनिस्ट नेता माओ त्से तुंग की क्रांतिकारी विचारधारा से प्रभावित था, जहां जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए पहली बार संगठित आवाज उठाई गई थी.
25 मई 1967: जब महिलाओं और बच्चों के खून से लाल हुई थी मिट्टी
24 मई को शुरू हुए इस विद्रोह के अगले ही दिन, यानी 25 मई 1967 को नक्सलबाड़ी ने इतिहास का सबसे दर्दनाक मंजर देखा. गांव के पुरुष उस समय वहां मौजूद नहीं थे और महिलाएं शांतिपूर्वक सभा कर रही थीं. इसी बीच पुलिस बल ने वहां पहुंचकर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी. उस खूनी खेल में गाउद्राउ सैरानी, खरसिंह मल्लिक, फूलमती देवी समेत नौ महिलाओं और दो मासूम बच्चों की जान चली गई. पुलिस मृतकों के शव भी अपने साथ ले गई, जिससे परिजनों को अंतिम दर्शन तक नसीब नहीं हुए. इस घटना ने आंदोलन की आग को पूरे देश में भड़का दिया.
देश के कई राज्यों में फैली चिंगारी, लाल सलाम से गूंजे थे जंगल
नक्सलबाड़ी से उठी यह लाल चिंगारी धीरे-धीरे बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र जैसे कई राज्यों के आदिवासी व जंगली इलाकों तक पहुंच गई. दशकों तक नक्सलवाद देश की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती बना रहा. हालांकि, बाद के समय में सरकारों के संयुक्त अभियानों, सुरक्षा बलों की कड़ाई और मुख्यधारा में लौटने की नीतियों के कारण बड़े पैमाने पर नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जिससे इस उग्रवाद के प्रभाव में भारी कमी आई.
आज बदल चुका है मिजाज, बंदूकों की जगह गूंज रहे हैं नए नारे
आज जब कोई नक्सलबाड़ी पहुंचता है, तो वहां बंदूकें नहीं बल्कि चाय की पत्तियां तोड़ती महिलाएं और बच्चों की खिलखिलाहट मिलती है. शहीद स्तंभ पर आज भी चारू मजूमदार और कार्ल मार्क्स की प्रतिमाएं उस दौर की गवाही देती हैं, लेकिन यहां की राजनीति पूरी तरह बदल चुकी है. साल 2017 में गृह मंत्री अमित शाह के दौरे के बाद यहां राजनीतिक हवा बदली और 2021 के चुनाव में भाजपा के आनंदमय बर्मन ने यहां बड़ी जीत दर्ज की. जहां कभी ‘लाल सलाम’ गूंजता था, आज वहां विकास की बातें और ‘जय श्रीराम’ के नारे सुनाई देते हैं. यह बदलाव यह साबित करता है कि वक्त के साथ जख्म भले भर गए हों, लेकिन इतिहास आज भी जिंदा है.
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