किशनगंज : जैन मुनि अरिजित सागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में चातुर्मास के दौरान तप, संयम और साधना का वातावरण बना हुआ है. इसी क्रम में लगातार आठ दिनों तक निराहार रहकर अठाई तप पूर्ण करने वाले तपस्वी मौलिक श्यामसुखा का दिगंबर जैन समाज की ओर से श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ अभिनंदन किया गया.
तपस्या के आठवें दिन समाज के श्रद्धालुओं ने तपस्वी के त्याग, संयम और आत्मबल की सराहना करते हुए तप की अनुमोदना की. इस अवसर पर जैन मुनि अरिजित सागर जी महाराज ने तपस्वी के मस्तक पर चंदन तिलक लगाकर आशीर्वाद प्रदान किया.
तप आत्मसंयम और आत्मशुद्धि की साधना : मुनिश्री
मुनिश्री अरिजित सागर जी महाराज ने कहा कि जैन धर्म में तप केवल अन्न-जल का त्याग नहीं, बल्कि आत्मसंयम, इंद्रिय नियंत्रण और आत्मशुद्धि की साधना है. तप के माध्यम से व्यक्ति अपनी आसक्ति और विकारों पर नियंत्रण पाने का प्रयास करता है.
आठ दिनों तक निराहार रहकर अठाई तप पूरा करना कठिन साधना मानी जाती है. मौलिक श्यामसुखा ने दृढ़ संकल्प और आत्मबल के साथ तपस्या पूरी कर समाज के सामने संयम और साधना का उदाहरण प्रस्तुत किया.
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणादायी है तपस्या
चातुर्मास के दौरान आयोजित तपस्या और अभिनंदन कार्यक्रम से दिगंबर जैन समाज में विशेष आध्यात्मिक उत्साह रहा. श्रद्धालुओं ने तपस्वी की साधना की अनुमोदना करते हुए उनके निरंतर आत्मकल्याण की मंगलकामना की.
समाज के वरिष्ठजनों ने कहा कि कठिन तप और संयम की साधना नई पीढ़ी को धर्म, अनुशासन और आत्मशुद्धि के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है. मौलिक श्यामसुखा की अठाई तपस्या पूर्ण होने पर समाज में श्रद्धा और भक्ति का माहौल बना रहा.
