किशनगंज जिला ने बनायी अपनी पहचान

किशनगंज : 14 जनवरी 1990 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा द्वारा किशनगंज को अलग जिला घोषित किये जाने के बाद आज किशनगंज जिला अपना स्थापना दिवस मना रहा है. आज 25 वसंत बीत जाने के बाद सूबे के उत्तर पूर्वी छोड़ पर स्थित किशनगंज जिला अपनी अलग पहचान बनाने में सफल हो गया है. तीनों […]

किशनगंज : 14 जनवरी 1990 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा द्वारा किशनगंज को अलग जिला घोषित किये जाने के बाद आज किशनगंज जिला अपना स्थापना दिवस मना रहा है. आज 25 वसंत बीत जाने के बाद सूबे के उत्तर पूर्वी छोड़ पर स्थित किशनगंज जिला अपनी अलग पहचान बनाने में सफल हो गया है.

तीनों ओर से पश्चिम बंगाल की सीमाओं के साथ-साथ पड़ोसी राज्य नेपाल व बांग्लादेश की सीमाओं से भी सटे रहने से सामरिक दृष्टिकोण से भी किशनगंज का अपना अलग महत्व है. पूर्व में आलमगंज के नाम से जाना जाने वाला किशनगंज पूर्णिया जिले का एक अनुमंडल मात्र था. परंतु इसके किशनगंज के रूप में जाने जाने का भी एक दिलचस्प इतिहास है. उस वक्त किशनगंज में खगड़ा नवाब मो फकीरूद्दीन का राज था. इसी दरम्यान एक साधु ने यहां प्रवेश किया.

किशनंगज की हरी भरी वादियों को देख उन्होंने यहां कुछ क्षण विश्राम करने का निर्णय लिया था. परंतु शहर का नाम आलमगंज शहर के बीचोबीच बहने वाली नदी का नाम रमजान व शासक का नाम फकरूद्दीन देख उन्होंने अपनी मंशा बदल डाली थी. परंतु साधु के शहर से वापस लौटने की जानकारी मिलते ही खगड़ा नवाब ने शहर का नाम बदल कर कृष्णा कूंज कर दिया था. जिसे आज किशनगंज के नाम से जाना जाता है.

1884 स्क्वायर किमी में फैले जिले की जनसंख्या वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार 1690948 है. जिले में कुल 7 प्रखंड बहादुरगंज, दिघलबैंक, किशनगंज, कोचाधामन, पोठिया, ठाकुरगंज व टेढ़ागाछ बनाये गये है. जबकि एक मात्र सब डिविजन किशनगंज है. हालांकि जिले में 70 प्रतिशत आबादी मुस्लिम, 29 प्रतिशत हिंदु व मात्र 1 प्रतिशत अन्य होने के बावजूद भी यहां की आपसी भाईचारगी की मिसाल विश्व के कोने कोने तक पहुंच गयी है.

परंतु साक्षरता के क्षेत्र में अब भी यह जिला सूबे के अन्य जिलों से काफी पिछड़ा है. नतीजतन जनसंख्या वृद्धि दर व मृत्यु दर भी अन्य जिलों की अपेक्षा काफी अधिक है. वहीं लगातार बढ़ रहे स्त्री व पुरूष अनुपात भी चिंता का कारण बन रहे है. वहीं जिले में रोजगार के अवसर का अभाव होने के कारण बड़ी संख्या में लोगों का पलायन भी हो चुका है. ऐसा नहीं है कि सरकारी योजनाओं को जिले में धरातल पर नहीं उतारा गया है.

इसके बावजूद भी कृषि प्रधान जिला होने के कारण पलायन को रोकने के लिए किये जा रहे सरकारी प्रयास नाकाफी ही साबित हो रहे है. पूर्वोत्तर के प्रवेश द्वार होने के कारण चिकेन नेक के नाम से मशहूर जिले में पयर्टन की भी अपार संभावनाएं है. परंतु सरकारी उदासीनता के कारण आज तक उन्हें अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका. रमजान नदी, ऐतिहासिक खगड़ा मेला जहां अपना अस्तित्व खोने की कगार पर पहुंच चुका है वहीं भीम वालिस, कच्चूदह झील, बड़ीजान, बेणुगढ़ आदि ऐतिहासिक स्थल आज भी उद्धारक की बाट जोह रहे हैं.

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