जिला आज मना रहा स्थापना की 30वीं वर्षगांठ

किशनगंज : किशनगंज को जिला घोषित हुए आज 30 साल पूरे हो गये. इन 30 सालों में इस जिले के अंदर बहुत कुछ बदल गया.कालांतर में कभी कृष्ण कुंज के नाम से यह इलाका जाना जाता था. वहीं महाभारत काल के घटनाओं को जिले के कई हिस्से आज भी समेटे हुए है. किशनगंज को जिले […]

किशनगंज : किशनगंज को जिला घोषित हुए आज 30 साल पूरे हो गये. इन 30 सालों में इस जिले के अंदर बहुत कुछ बदल गया.कालांतर में कभी कृष्ण कुंज के नाम से यह इलाका जाना जाता था. वहीं महाभारत काल के घटनाओं को जिले के कई हिस्से आज भी समेटे हुए है. किशनगंज को जिले का दर्जा पाने में दशकों लग गये.

चायपत्ती, धान, पाट, अदरक की खेती के लिए किशनगंज का पूरे सूबे में अपना महत्व है. 1990 से पूर्व किशनगंज पूर्णिया जिले का हिस्सा था. मुख्यालय करीब सौ एकड़ भूमि में फैला हुआ है. प्राकृतिक सौंदर्य और साफ सफाई, अधिक बारिश और खुशगवार मौसम किशनगंज को अलग बनाती है.
14 जनवरी 1990 को बना था किशनगंज जिला
14 जनवरी 1990 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा द्वारा किशनगंज को अलग जिला घोषित किया गया था. आज किशनगंज जिला अपना स्थापना दिवस मना रहा है. आज 30 वसंत बीत जाने के बाद सूबे के उत्तर पूर्वी छोड़ पर स्थित और पूर्वोत्तर के प्रवेश द्वार कहे जाने वाले किशनगंज जिला अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रहा.
तीनों ओर से पश्चिम बंगाल की सीमाओं के साथ-साथ पड़ोसी राज्य नेपाल व बांग्लादेश की सीमाओं से भी सटे रहने से सामरिक दृष्टिकोण से भी किशनगंज का अपना अलग महत्व है. पूर्व में कृष्ण कुंज तथा आलमगंज के नाम से जाना जाने वाला किशनगंज पूर्णिया जिले का एक अनुमंडल मात्र था.
परंतु इसके किशनगंज के रूप में जाने जाने का भी एक दिलचस्प इतिहास है. उस वक्त किशनगंज में खगड़ा नवाब मो. फकीरूद्दीन का राज था. इसी दरम्यान एक साधु ने यहां प्रवेश किया. किशनंगज की हरी भरी वादियों को देख उन्होंने यहां कुछ क्षण विश्राम करने का निर्णय लिया था. परंतु शहर का नाम आलमगंज शहर के बीचों बीच बहने वाली नदी का नाम रमजान व शासक का नाम फकरूद्दीन देख उन्होंने अपनी मंशा बदल डाली थी.
परंतु साधु के शहर से वापस लौटने की जानकारी मिलते ही खगड़ा नवाब ने शहर का नाम बदल कर कृष्णा कूंज कर दिया था. जिसे आज किशनगंज के नाम से जाना जाता है. 1884 स्क्वायर किमी में फैले जिले की जनसंख्या 20 लाख के करीब है. जिले में कुल 7 प्रखंड बहादुरगंज, दिघलबैंक, किशनगंज, कोचाधामन, पोठिया, ठाकुरगंज व टेढ़ागाछ है. जबकि एक मात्र सब डिविजन किशनगंज है. हालांकि जिले में 70 प्रतिशत
चायपत्ती, धान, पाट, अदरक की खेती के लिए किशनगंज का पूरे सूबे में अपना महत्व है. 1990 से पूर्व किशनगंज पूर्णिया जिले का हिस्सा था. मुख्यालय करीब सौ एकड़ भूमि में फैला हुआ है. प्राकृतिक सौंदर्य और साफ सफाई, अधिक बारिश और खुशगवार मौसम किशनगंज को अलग बनाती है.
14 जनवरी 1990 को बना था किशनगंज जिला
14 जनवरी 1990 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा द्वारा किशनगंज को अलग जिला घोषित किया गया था. आज किशनगंज जिला अपना स्थापना दिवस मना रहा है. आज 30 वसंत बीत जाने के बाद सूबे के उत्तर पूर्वी छोड़ पर स्थित और पूर्वोत्तर के प्रवेश द्वार कहे जाने वाले किशनगंज जिला अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रहा. तीनों ओर से पश्चिम बंगाल की सीमाओं के साथ-साथ पड़ोसी राज्य नेपाल व बांग्लादेश की सीमाओं से भी सटे रहने से सामरिक दृष्टिकोण से भी किशनगंज का अपना अलग महत्व है.
पूर्व में कृष्ण कुंज तथा आलमगंज के नाम से जाना जाने वाला किशनगंज पूर्णिया जिले का एक अनुमंडल मात्र था. परंतु इसके किशनगंज के रूप में जाने जाने का भी एक दिलचस्प इतिहास है. उस वक्त किशनगंज में खगड़ा नवाब मो. फकीरूद्दीन का राज था. इसी दरम्यान एक साधु ने यहां प्रवेश किया.
किशनंगज की हरी भरी वादियों को देख उन्होंने यहां कुछ क्षण विश्राम करने का निर्णय लिया था. परंतु शहर का नाम आलमगंज शहर के बीचों बीच बहने वाली नदी का नाम रमजान व शासक का नाम फकरूद्दीन देख उन्होंने अपनी मंशा बदल डाली थी.
परंतु साधु के शहर से वापस लौटने की जानकारी मिलते ही खगड़ा नवाब ने शहर का नाम बदल कर कृष्णा कूंज कर दिया था. जिसे आज किशनगंज के नाम से जाना जाता है. 1884 स्क्वायर किमी में फैले जिले की जनसंख्या 20 लाख के करीब है.
जिले में कुल 7 प्रखंड बहादुरगंज, दिघलबैंक, किशनगंज, कोचाधामन, पोठिया, ठाकुरगंज व टेढ़ागाछ है. जबकि एक मात्र सब डिविजन किशनगंज है. हालांकि जिले में 70 प्रतिशत आबादी मुस्लिम, 29 प्रतिशत हिंदू व मात्र 1 प्रतिशत अन्य होने के बावजूद भी यहां की आपसी भाईचारा की मिसाल विश्व के कोने कोने तक पहुंच गयी है. परंतु साक्षरता के क्षेत्र में अब भी यह जिला सूबे के अन्य जिलों से काफी पिछड़ा है.
नतीजतन जनसंख्या वृद्धि दर , लगातार बढ़ रहे स्त्री व पुरुष अनुपात भी चिंता का कारण बन रहे है. वहीं जिले में रोजगार के अवसर का अभाव होने के कारण बड़ी संख्या में लोगों का पलायन भी हो चुका है. ऐसा नहीं है कि सरकारी योजनाओं को जिले में धरातल पर नहीं उतारा गया है. इसके बावजूद भी कृषि प्रधान जिला होने के कारण बेरोजगारी यहां भी प्रमुख मुद्दा है. पूर्वोत्तर के प्रवेश द्वार होने के जिले में पर्यटन की भी अपार संभावनाएं है.
रमजान नदी, ऐतिहासिक खगड़ा मेला जहां अपना अस्तित्व खोने की कगार पर पहुंच चुका है वहीं भीम वालिस, कच्चूदह झील, बड़ीजान, बेणुगढ़ आदि ऐतिहासिक स्थल पर सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नजर पड़ी, उन्होंने अभी हाल ही में वेनुगढ़ और ठाकुरगंज का दौरा भी किया है जिसके बाद इन पौराणिक स्थलों के विकसित होने की संभावना बढ़ी है.

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