सतखुट्टी में सद्धिपीठ के रुप में होती है मां की पूजा

परबत्ता : प्रखंड के विभिन्न पंचायतों में दशहरा को लेकर तैयारियां जोरों से चल रही है. ऐसे में नयागांव सतखुट्टी में दशकों के चल रही पूजा की चर्चा प्रासंगिक है. जोरावरपुर पंचायत अंतर्गत नयागांव सतखुट्टी में वर्षों से चली आ रही चतुर्भुज देवी की पूजा का एक अलग ही महत्व है. ऐसा कहा जाता है […]

परबत्ता : प्रखंड के विभिन्न पंचायतों में दशहरा को लेकर तैयारियां जोरों से चल रही है. ऐसे में नयागांव सतखुट्टी में दशकों के चल रही पूजा की चर्चा प्रासंगिक है.

जोरावरपुर पंचायत अंतर्गत नयागांव सतखुट्टी में वर्षों से चली आ रही चतुर्भुज देवी की पूजा का एक अलग ही महत्व है. ऐसा कहा जाता है कि सन् 1800 ई के द्वितीय दशक में सप्तमी वंश के मेहरबान सिंह को देवी ने दर्शन देकर मंदिर स्थापित कर पूजा प्रारंभ करने की प्रेरणा दिया.

इस प्रकार इस मंदिर की स्थापना को दो सौ वर्ष पूरे हो गये हैं. यह मंदिर तब वर्तमान स्थल से दूर सतखुट्टी टोले में स्थित था. कालांतर में गंगा नदी के कटाव से यह टोला विस्थापित हो गया.

कहा जाता है कि टोले की पूरी आबादी को कटाव से विस्थापित करने के बाद गंगा नदी मंदिर तक पहुंचकर अपने मूल स्थान को लौट गयी. बाद में जहां मंदिर स्थापित था वह स्थान एक टीले के रुप में उभरकर उपर आया. वर्ष 1979 में पुराने मंदिर के मिट्टी को एकत्रित कर वर्तमान स्थल पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया.

ऐसी मान्यता है कि देवी के इस दरबार से आजतक कोई खाली हाथ नहीं लौटा है. नवरात्र के दौरान पूरे नौ दिनों तक संध्या काल में भव्य आरती का आयोजन होता है. इसमें आस पास के कई पंचायतों के श्रद्धालू भक्त भाग लेते हैं. नवरात्र के प्रथम दिन मंदिर से गाजे बाजे एवं हाथी घोड़ों के साथ कलश यात्रा शुरू होती है.

पूर्ण संकल्प के साथ मंदिर के मुख्य पुरोहित कलश में गंगा जल भर कर जब मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं तो हजारों की संख्या में साथ चल रही महिलाओं के बीच मुख्य पंडा के चरणों में जल चढाने को लेकर होड़ मच जाती है.

इस मंदिर में देवी की प्रतिमा का निर्माण सिद्ध शिल्पकार की बजाय गांव के ही एक ही परिवार के सदस्य द्वारा किया जाता है. प्रचलित मान्यता है कि नयागांव के कार्तिक स्वर्णकार के पूर्वजों को देवी ने स्वप्न में यह आदेश दिया कि मेरी मूर्ति प्रत्येक वर्ष तुम या तुम्हारे परिवार का ही कोई सदस्य बनायेगा. स्वर्णकार ने देवी मां से कहा कि हे मां मुझे मूर्ति बनाना नहीं आता है.

इसके अलावा मेरे वंशज यह काम करेंगे या नहीं,यह भी नहीं जानता हूं. मां से स्वर्णकार से कहा कि तुम केवल मिट्टी रखते जाओगे और मूर्ति खुद बन जायेगी. इतना कहते ही मां अंतर्ध्यान हो गयी. तब से आज तक बिना किसी प्रशिक्षण के इस परिवार के लोगों द्वारा मूर्ति का निर्माण किया जाता रहा है. मंदिर की आय का एक हिस्सा समाज के सभी वर्गों के बीच वितरित किया जाता है.

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