गोगरी. आधुनिकता के दौर में शहरी क्षेत्रों में अब मिट्टी से बनने वाले घरौंदों का प्रचलन नाम मात्र का रह गया है. लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इसका प्रचलन अब भी जारी है. घरौंदे तैयार करने के लिए छोटी-छोटी बच्चियां अपने घर से दूर जाकर मिट्टी लाती है तथा अपने-अपने घरों में आकर्षक घरौंदे बनाती हैं. जिस स्थान से बच्चियां मिट्टी लाती है.
अक्सर वैसा स्थान काफी खतरनाक होता है. जिसके कारण मिट्टी में दब कर घरौंदे से खेलने वाली गुड़िया की जान को खतरा बना रहता है. दीपों का पर्व दीपावली के मौके पर गणेश-लक्ष्मी की पूजा के साथ-साथ घरौंदा की पूजा करने की भी परंपरा रही है. लेकिन समय के साथ घरौंदा पूजा में भी आधुनिकता का रंग चढ़ गया है. तथा कंप्यूटर युग में लोग इस पुरानी परंपरा से कटते जा रहे हैं. यही कारण है कि अब घरों में मिट्टी का घरौंदा की जगह थर्मोकोल व चदरा (टीन) निर्मित बाजार में बिक रहे घरौंदा खरीद कर पूजा की रस्म अदायगी करते हैं.
खत्म होने लगी घरौंदा पूजने की परंपरा
दीपावली के मौके पर महिलाएं, युवतियां मिट्टी से घरौंदा तैयार करती थी. फिर उसको रंगों से सजाती थी. मिट्टी के दीये जलाकर नौ प्रकार के चीनी निर्मित रंग-बिरंगे मिठाई, सात प्रकार का भूंजा आदि मिट्टी के बर्तन में भरकर विधि-विधान के साथ महिलाएं घरौंदा पूजन करती थी. इसके बाद आतिशबाजी की जाती थी. लेकिन यह परंपरा शहर में तो पूरी तरह समाप्त होती नजर आ रही है. ग्रामीण क्षेत्रों में थोड़ी बहुत इसकी रस्म अदायगी भले ही की जा रही है.
मिट्टी के घरौंदे का बदला स्वरूप
समय के साथ सबकुछ बदल गया. नयी पीढ़ी के बच्चे, महिलाएं मिट्टी का घरौंदा बनाना पसंद नहीं कर रही है. यही कारण है कि बाजारों में रेडीमेड घरौंदा बिकने लगा है. ग्रामीण क्षेत्र के लोग भी बाजार से थर्मोकोल एवं चदरा निर्मित घरौंदा खरीदने लगे हैं. 200 से 300 रुपये तक में रेडीमेड घरौंदा बाजार में उपलब्ध है.
