कटिहार के कोढ़ा से अमीर सोहेल की रिपोर्ट
Veterinary Hospital: बिहार सरकार जहां एक ओर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए पशुपालन को बढ़ावा देने और मवेशियों के लिए मुफ्त चिकित्सा व दवाइयां उपलब्ध कराने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है. कटिहार जिले के कोढ़ा प्रखंड राजकीय पशु चिकित्सालय से अव्यवस्था और गरीब पशुपालकों के कथित आर्थिक शोषण का एक बेहद चिंताजनक मामला सामने आया है. अस्पताल परिसर में आवश्यक सरकारी दवाओं की भारी कमी या अनुपलब्धता के कारण दूर-दराज के गांवों से आने वाले लाचार पशुपालकों को खुले बाजार से ऊंचे दामों पर दवाएं और इंजेक्शन खरीदने के लिए विवश होना पड़ रहा है, जिससे गरीब किसानों की कमर टूट रही है.
फुलडोवी गांव के पीड़ित ने खोला मोर्चा, सादे कागज पर लिखी जा रही पर्ची
पशु अस्पताल की इस अव्यवस्था और पीड़ित किसानों की आपबीती को निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
- व्हाइट पेपर पर लिखी दवा: कोढ़ा प्रखंड के फुलडोवी गांव निवासी पीड़ित पशुपालक श्रवण मंडल ने अपनी व्यथा सुनाते हुए बताया कि वे बुधवार को अपने बीमार मवेशी के इलाज के लिए कोढ़ा पशु चिकित्सालय पहुंचे थे. वहाँ तैनात डॉक्टर विकास कुमार ने पशु की जांच तो की, लेकिन अस्पताल के सरकारी स्टॉक में दवा न होने की बात कहकर एक सादे (व्हाइट) पेपर पर बाहर की महंगी दवाइयां लिख दीं और बाजार से खरीदकर लाने को कहा.
- गरीबों पर दोहरी मार: पीड़ित श्रवण मंडल का कहना है कि वे एक साधारण और अत्यंत गरीब पशुपालक हैं, जिनके लिए घर चलाना मुश्किल है; ऐसे में निजी मेडिकल स्टोर से हजारों रुपये की दवाएं खरीदना उनके बजट से बाहर है. उन्होंने आरोप लगाया कि यह समस्या सिर्फ उनकी नहीं है, बल्कि प्रतिदिन अस्पताल आने वाले दर्जनों गरीब ग्रामीणों को इसी तरह बैरंग या भारी आर्थिक चपत लगवाकर वापस भेजा जा रहा है.
कैमरे के सामने भागे प्रभारी; अनौपचारिक बातचीत में स्वीकारी दवाओं की कमी
अस्पताल प्रशासन का उदासीन रवैया: जब इस गंभीर अव्यवस्था और पशुपालकों के आरोपों को लेकर स्थानीय पत्रकारों ने कोढ़ा पशु चिकित्सालय के प्रभारी और संबंधित डॉक्टर विकास कुमार से उनका पक्ष जानने का प्रयास किया, तो वे कैमरे के सामने कुछ भी आधिकारिक बयान देने से साफ बचते नजर आए और पल्ला झाड़ लिया. हालांकि, बाद में अनौपचारिक बातचीत (Off the Record) में डॉक्टर विकास कुमार ने यह स्वीकार किया कि जो दवाइयां वर्तमान में सरकारी आपूर्ति (गवर्नमेंट सप्लाई) के तहत अस्पताल के स्टोर रूम में उपलब्ध नहीं हैं, केवल उन्हीं आवश्यक दवाओं को मजबूरी में पशुपालकों द्वारा बाहर के निजी मेडिकल स्टोर से मंगवाया जाता है.
सरकारी योजनाओं का जमीनी स्तर पर नहीं मिल रहा लाभ, जांच की मांग
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रबुद्ध ग्रामीणों का कहना है कि सरकार द्वारा पशुओं के प्राथमिक उपचार के लिए पर्याप्त बजट और मुफ्त दवाइयों का प्रावधान किया गया है, लेकिन कोढ़ा अस्पताल के स्टोर से दवाइयां आखिर कहाँ गायब हो रही हैं, यह एक बड़ा जांच का विषय है. इस घटना के बाद से पूरे कोढ़ा क्षेत्र के किसानों में स्वास्थ्य विभाग के खिलाफ गहरा आक्रोश व्याप्त है.
ग्रामीणों ने जिला पशुपालन पदाधिकारी (DHO) और कटिहार के जिला पदाधिकारी (DM) से लिखित शिकायत कर इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने, अस्पताल में दवाओं का पर्याप्त स्टॉक सुनिश्चित करने और सादे कागज पर निजी पर्ची लिखने वाले डॉक्टरों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने की पुरजोर मांग की है. अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस गंभीर मुद्दे पर क्या संज्ञान लेता है और कोढ़ा के गरीब पशुपालकों को इस मानसिक व आर्थिक प्रताड़ना से कब तक राहत मिल पाती है.
