प्रवासी पक्षियों के कलरव से गूंज रहा गोगाबिल रामसर स्थल, 10 हजार पक्षी पहुंचे

प्रवासी पक्षियों के कलरव से गूंज रहा गोगाबिल रामसर स्थल, 10 हजार पक्षी पहुंचे

– गोगबिल सहित कटिहार के छह जलाशयों में जल पक्षी गणना कार्यक्रम संपन्न कटिहार बिहार में एशियाई मध्य शीतकालीन जल पक्षी गणना कार्यक्रम इसी माह के पिछले हफ्ते संपन्न हुआ है. पूरे बिहार में यह एक उत्सव का माहौल रहा. जहाँ राज्य के 140 से भी ज्यादा जलाशयों में एक साथ स्थानीय और प्रवासी पक्षियों की गिनती की गयी. प्रवासी पक्षी हमारे यहां दशहरे-दीवाली में आते हैं और होली खेलकर अपने देश चले जाते हैं. कटिहार जिले में राज्य के अति समृद्ध पक्षी क्षेत्र गोगाबील झील सहित कटिहार जिले के छह जलाशयों में पक्षियों की गणना 10 और 11 फरवरी को की गयी. जिनमें भवाड़ा कोठी, मनिहारी के निकट ईंट भट्ठा के पास कनचिरा, बल्दिया चौर, कठौतिया पौंड, बघार बील भी शामिल है. यहां पक्षियों की गणना बिहार के जाने-माने पक्षीविद अरविन्द मिश्रा के नेतृत्व में किया गया. जिनके साथ पटना के युवा पक्षी विशेसज्ञ आरूष और नौगछिया के बिट्टू कुमार के अलावा मनिहारी और अमदाबाद के वनरक्षी नितीश कुमार और सुरेन्द्र कुमार भी शामिल थे. वन प्रमंडल पदाधिकारी राजीव रंजन व वन क्षेत्र पदाधिकारी मंटू पासवान का इस कार्यक्रम में भरपूर सहयोग रहा. यह सर्वेक्षण वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, बिहार सरकार और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएच०एस) के सहयोग से किया जाता है. पिछले वर्ष राज्य के करीब 110 जलाशयों को इसमें शामिल किया गया था. जबकि इस वर्ष लगभग 144 जलाशयों में मध्य शीतकाल में पक्षियों की गिनती की गयी है. हालांकि मौसम में उथल-पुथल रही. अक्तूबर माह में बारिश की वजह से जलाशयों में जल की अधिकता देखी गयी. वहीँ सर्द मौसम भी हल्की गर्मी का अहसास देता दिखा. बदलते मौसम चक्र का असर पक्षियों की उपस्थिति पर भी देखने को मिला. पक्षियों की उपस्थिति बदलते मौसम को सहज ही बता देती है. इसलिए प्रत्येक वर्ष पक्षियों की स्थिति का आकलन किया जाना महत्वपूर्ण हो जाता है. बघार बील में बड़ी संख्या में मिले देसी व प्रवासी पक्षी पक्षी गणना के क्रम में जिले के भवरा कोठी के सात तालाबों में पक्षी कम ही दिखे. पक्षी विशेषज्ञ अरविंद मिश्रा कहते है कि मौसम के अप्रत्याशित करवट लेने का यह परिणाम हो सकता है. स्थानीय पक्षी लेसर व्हिसलिंग डक यानी छोटी सिल्ली मात्र 44 की संख्या में दिखे. पर प्रवासी ग्रीन सैंडपाइपर यानी हरा चौबाहा का 26 के झुंड में दिखायी देना अद्भुत था. सामान्यतया ये पक्षी अकेले या छोटे झुंड में दिखाई देते है. इसके अलावा स्थानीय पक्षी ओरिएंटल डार्टर यानी बानवै, ग्रेट कोर्मोरेंट यानी बड़ा पनकौवा और स्टोर्क बिल्ड किंगफ़िशर यानी बड़ा किलकिला भी मिले. मनिहारी के कनचिरा जलाशय में ईंट भट्ठों के अत्यधिक फैलाव और किसानी गतिविधियों के कारण पक्षियों की संख्या नगण्य रही. बल्दिया चौर में पक्षियों की अच्छी संख्या थी. यहां तीन लेसर एडजुटेंट यानी छोटा गरुड़ के अलावा सात की संख्या में ओरिएण्टल डार्टर, प्रवासी पक्षी ओस्प्रे यानी मछलीमार, रोजी पिपीट यानी गुलाबी चरचरी, सिट्रीन वैगटेल यानी पिलकिया खंजन, व्हाईट वैगटेल यानी सफ़ेद खंजन दिखे. बल्दिया चौर में भी अधिवास की विविधता के कारण अच्छे-खासे पक्षी दिखाई देते है. इस चौर में मखाना की खेती होने के कारण जल की उपलब्धता ठीक रहती है. जिस कारण पक्षी आकर्षित होते है. पक्षी विशेषज्ञ श्री मिश्रा के अनुसार बघार बील में भी देसी एवं प्रवासी पक्षियों की अच्छी संख्या देखने को मिली. पक्षी तो करीब 500 ही मिले. लेकिन उनकी प्रजातियां 42 थी, जो गोगाबील से भी ज्यादा थी. प्रवासी पक्षियों में साइबेरियन स्टोनचैट यानी भटपिद्दा, लॉन्ग लेग्ड बज़ार्ड यानी चूहामार, ग्रीन सैंडपाइपर यानी भूरा चौबाहा, यूरेशियन कूट यानी सरार, व्हाईट आइड पोचार्ड यानी कर्चिया बतख, रेड क्रेस्टेड पोचार्ड यानी लालसर के साथ स्थानीय कॉटन पिग्मी गूज यानी गिर्री, बंगाल बुश लार्क यानी छुटदुम झाड़ भरत और और कुछ खास जगहों पर ही दिखने वाले स्ट्राएटेड बाब्लर यानी बड़ा गेंगा मौजूद थे. गोगबिल में मिले कई दुर्लभ प्रजाति के पक्षी उल्लेखनीय है कि नवंबर 2025 में गोगाबील झील को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रामसर साईट का दर्जा दिया गया है . सन 2019 में गोगा बील को बिहार के एकमात्र कम्युनिटी रिज़र्व और कन्जेर्वेशन रिज़र्व के रूप में घोषित भी किया गया है. पक्षी विशेषज्ञ अरविंद मिश्रा की मानें तो इस झील में मछली मारने के लिए अवैध रूप से नौकाओं के परिचालन को रोकने के लिए स्लुइस गेट का निर्माण हुआ है. जिसका असर यहां देसी और प्रवासी पक्षियों की संख्या पर स्पष्ट नजर आया और यहां रिकॉर्ड संख्या में कारीब 10000 पक्षी देखे गये, जो इस छोटी सी झील के लिए अप्रत्याशित है. सबसे अधिक संख्या यहां 3000 रेड क्रेस्टेड पोचार्ड यानी लालसर की दिखी और लेसर व्हिसलिंग डक यानी छोटी सिल्ली की संख्या भी 2000 के करीब थी. जिसके साथ फल्वस व्हिसलिंग डक यानी बड़ी सिल्ली भी करीब 200 की संख्या में थी, जो राज्य में अन्यत्र बहुत कम दिखायी देती है. प्रवासी 2000 यूरेशियन कूट यानी सरार के अलावा गडवाल यानी मैल, नोर्दर्न पिनटेल सींखपर, व्हाईट आइड पोचार्ड यानी कर्चिया बतख, गार्गेनी यानी चैता और ग्रेट क्रेस्टेड ग्रीब यानी शिवा हंस भी यहाँ अच्छी संख्या में दिखे. नोर्दर्न लैपविंग यानी शाबाज़ टिट्टी या काली टिटहरी का झुण्ड इस बार भी देखने को नहीं मिला, जो हो सकता है कि कहीं खेतों में छिपा हो. गोगाबील आने वाले पक्षी प्रेमियों की यह चाहत होती है कि यह पक्षी उन्हें देखने को मिल जाय.यहां 70 ग्लॉसी आईबीस यानी कौआरी बुज्जा को देखकर मन प्रसन्न हो जाता है.

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By RAJKISHOR K

RAJKISHOR K is a contributor at Prabhat Khabar.

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