चुनावी साल में न नेता और न प्रशासन को है किसानों की चिंता किसानों के लिए अब घाटे का सौदा साबित हो रही है मखाना की खेती कोढ़ा चुनावी साल शुरू है. नेता वादों की झड़ियां लगा रहे हैं लेकिन जिले के काफी संख्या में किसान बेचैन हैं. दरअसल कोढ़ा में मखाना लावा के लगातार गिरते दर ने स्थानीय मखाना व्यवसायियों व किसानों की चिंता बढ़ा दी है. एक समय में लाभकारी माने जाने वाले इस व्यवसाय को अब मंदी का सामना करना पड़ रहा है. जिससे जुड़े हजारों लोगों की आजीविका पर संकट मंडरा रहा है. कटिहार जिले के कोढा व फलका मखाना उत्पादन के प्रमुख केंद्र माने जाते हैं. परंपरागत तरीके से तालाबों में मखाना की खेती करने वाले किसानों का कहना है कि इस साल लावा (फूला मखाना) का थोक मूल्य आज के समय 650-670 प्रति किलोग्राम पर बिक रही है. जो की जुलाई, अगस्त में 1000 रुपये की दर से बिक रही थी. खुदरा बाजार में भी बिक्री प्रभावित हुई है. स्थानीय व्यवसायी रंजीत चौधरी ने बताया की मखाना की मांग पहले की तरह बनी हुई है. बाजार में बिचौलियों और बड़े कंपनियों की एंट्री से छोटे व्यापारियों को नुकसान हो रहा है. लावा के गिरते भाव से प्रभावित हुई है. मखाना प्रोसेसिंग यूनिट लेकिन बाजार मूल्य में भारी गिरावट ने उन्हें घाटे में डाल दिया है. उन्होंने सरकार से न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की मांग की है. ताकि किसानों और छोटे व्यापारियों को सुरक्षा मिल सके. रंजीत चौधरी ने जानकारी दी की मखाना के मूल्य में गिरावट का एक कारण चीन और अन्य देशों से आ रहे सस्ते फॉक्स नट्स हैं जो भारतीय बाजार में धड़ल्ले से बिक रहे हैं. प्रोसेसिंग और मार्केटिंग में स्थानीय स्तर पर तकनीकी सहायता की कमी भी एक बड़ी समस्या है. व्यवसायियों और किसानों ने केंद्र और राज्य सरकार से मांग की है कि मखाना को राष्ट्रीय स्तर पर जीआई टैग मिलने के बाद इसके संरक्षण और संवर्धन के लिए ठोस कदम उठाए जायें. निर्यात को बढ़ावा देने, स्थानीय मंडियों में स्थिर मूल्य नीति लागू करने और प्रोसेसिंग यूनिट्स को प्रोत्साहन देने की भी आवश्यकता बतायी. मखाना न केवल मिथिला की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है, बल्कि हजारों लोगों की आजीविका का माध्यम भी है. यदि समय रहते इस उद्योग की समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो इसका व्यापक आर्थिक और सामाजिक प्रभाव पड़ सकता है.
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