गृहस्थ आश्रम ही समाज की नींव व सभी आश्रमों का आधार : जीयर स्वामी

25 कुंडीय श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ में उमड़ा श्रद्धालुओं का जनसैलाब

25 कुंडीय श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ में उमड़ा श्रद्धालुओं का जनसैलाब. रामपुर. प्रखंड क्षेत्र के बहेरी गांव में प्रपन्न जियर स्वामी जी महाराज के सानिध्य में 25 कुंडीय श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ में गुरुवार की रात कथा के दूसरे दिन स्वामी जी ने गृहस्थ आश्रम की महिमा बतायी. उन्होंने कहा कि गृहस्थ आश्रम हिंदू धर्म के वर्णाश्रम व्यवस्था का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण आश्रम है. आश्रमों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जीवन में चार आश्रम होते हैं. प्रथम ब्रह्मचर्य (0-25 साल) जो शिक्षा, अनुशासन व गुरु सेवा के लिए है. द्वितीय गृहस्थ (25-50 साल) जो विवाह, परिवार, समाज व धर्म पालन के लिए है. तृतीय वानप्रस्थ (50-75 साल) जिसमें धीरे-धीरे मोह त्याग व समाज सेवा की जाती है व चौथा संन्यास (75 साल से ऊपर) जो पूर्ण त्याग व मोक्ष की साधना के लिए है. स्वामी जी ने कथा के माध्यम से बताया कि गृहस्थ आश्रम ही मनुष्य समाज की नींव है. इसे सभी आश्रमों का आधार माना गया है, क्योंकि गृहस्थ ही बाकी तीनों आश्रमों का पालन-पोषण करता है. ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासी सब गृहस्थ पर ही निर्भर रहते हैं. यह आश्रम चार पुरुषार्थ का संतुलन है. गृहस्थ में ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थ एक साथ सधते हैं. सिर्फ धन कमाना या भोग विलास ही नहीं, बल्कि धर्म के अनुसार जीवन जीना गृहस्थ आश्रम का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए. उन्होंने बताया कि हर गृहस्थ के लिए रोज पांच यज्ञ जरूरी माने गये हैं. इनमें ब्रह्म यज्ञ (पढ़ना-पढ़ाना व स्वाध्याय), देव यज्ञ (पूजा-पाठ व हवन), पितृ यज्ञ (माता-पिता व पूर्वजों की सेवा), भूत यज्ञ (जीव-जंतु, गाय-कुत्ते को भोजन देना) व मनुष्य यज्ञ (अतिथि सत्कार व गरीबों की मदद) शामिल हैं. परिवार का पालन-पोषण, संतान को संस्कार देना व राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी निभाना ही मुख्य धर्म है. स्वामी जी ने कहा कि जैसे सभी जीव वायु के सहारे जीते हैं, वैसे ही सभी आश्रम गृहस्थ के सहारे चलते हैं. इसलिए गृहस्थ आश्रम को त्याग में रहकर भोग और भोग में रहकर त्याग का आदर्श माना गया है. उन्होंने विवाह संस्कार, पति-पत्नी के कर्तव्य व आधुनिक समय में इसकी प्रासंगिकता पर भी व्याख्या दी. इस दौरान पंडाल में बैठे सैकड़ों श्रद्धालु व श्रोता ज्ञान की गंगा में डुबकी लगाते रहे.

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Author: VIKASH KUMAR

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